समावेशन कोई दया या करुणा नहीं, एक अधिकार है : सुश्री मनमीत कौर नंदा
शब्दवाणी सम्माचार टीवी, वीरवार 29 जनवरी 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। समावेशन कोई दया या करुणा का विषय नहीं है, बल्कि यह एक अधिकार है। इस सशक्त वक्तव्य के साथ सुश्री मनमीत कौर नंदा, अपर सचिव, दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (DEPwD) ने आज पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स, नई दिल्ली में आयोजित स्माइल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल फॉर चिल्ड्रन एंड यूथ (SIFFCY) के 12वें संस्करण के उद्घाटन समारोह में अपनी बात रखी। उन्होंने समावेशन को केवल बुनियादी ढांचे या औपचारिक अनुपालन तक सीमित न रखते हुए, सोच और संवेदनशीलता में मानवीय परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया। नीतिनिर्माताओं, राजनयिकों, फिल्मकारों, शिक्षाविदों और युवा दर्शकों की विशिष्ट उपस्थिति के बीच अपने संबोधन में सुश्री नंदा ने भारत में दिव्यांगजनों की वास्तविक स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 2.68 करोड़ दिव्यांगजनों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह आंकड़ा वास्तविक संख्या से कहीं कम है। इनमें लगभग 80 लाख दिव्यांग बच्चे ऐसे हैं जो शिक्षा, सार्वजनिक स्थलों और यहां तक कि सिनेमा हॉल में फिल्म देखने जैसे साधारण आनंद से भी वंचित हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2021 के ऐतिहासिक निर्णयविकाश कुमार बनाम यूपीएससीका उल्लेख करते हुए कहा कि ‘उचित समायोजन’ कोई विकल्प नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है, जिससे दिव्यांगजनों की समान भागीदारी सुनिश्चित हो सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि डिस्लेक्सिया से ग्रस्त बच्चे को अतिरिक्त समय न देना या ऑटिज़्म से ग्रस्त बच्चे को प्रवेश से वंचित करना व्यावहारिकता नहीं, बल्कि भेदभाव है।
अपने संबोधन को और अधिक व्यक्तिगत बनाते हुए सुश्री नंदा ने कहा कि वास्तविक समावेशन केवल सरकारी आदेशों से संभव नहीं है। जिला मजिस्ट्रेट के रूप में अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने ऐसे रैम्प्स और सुलभ शौचालयों का उल्लेख किया जो केवल दिखावे तक सीमित रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि सच्चा समावेशन सहनशीलता से स्वीकार्यता और स्वीकार्यता से उत्सव की ओर बढ़ने की प्रक्रिया है। उन्होंने सिनेमा को सहानुभूति विकसित करने और पूर्वाग्रह तोड़ने का एक सशक्त माध्यम बताया, विशेषकर तब जब दिव्यांग पात्रों को दया या प्रेरणा की वस्तु नहीं, बल्कि पूर्ण, जटिल और संवेदनशील इंसान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लद्दाख के विशेष आवश्यकता वाले बच्चों द्वारा निर्मित फिल्मलिटिल बिग ड्रीम्सका उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब बच्चे स्वयं अपनी कहानियों के रचनाकार बनते हैं, तभी समावेशन का वास्तविक अर्थ साकार होता है। उत्सव की वैश्विक भावना को रेखांकित करते हुए फिनलैंड के राजदूत श्री किम्मो लाहदेविर्ता ने सिनेमा की उस शक्ति की बात की जो देशों और संस्कृतियों को जोड़ती है। SIFFCY के साथ फिनलैंड की दीर्घकालिक साझेदारी को दोहराते हुए उन्होंने फिनलैंड की लघु फिल्मों और एक बाल-फंतासी फिल्म के प्रदर्शन की जानकारी दी। बच्चों के लिए विशेष आकर्षण के रूप में उन्होंने पहली बार SIFFCY में लोकप्रिय ‘मूमिन्स’ पात्रों को बड़े पर्दे पर प्रस्तुत किए जाने की घोषणा की, जो फिनिश सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
एस्टोनिया की राजदूत सुश्री मार्जे लूप ने स्माइल फिल्म फेस्टिवल को भारत में बाल एवं युवा सिनेमा का एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मंच बताया। उन्होंने इस वर्ष के मुख्य विषय समावेशन, विविधता, सुलभता और समानता—पर प्रकाश डालते हुए बताया कि एस्टोनिया इस वर्ष बच्चों द्वारा बनाई गई छह लघु फिल्मों के साथ भाग ले रहा है, जिनमें यूक्रेन के शरणार्थी बच्चों की फिल्में भी शामिल हैं। उन्होंने एस्टोनिया की समृद्ध फिल्म और एनीमेशन परंपरा तथा प्रतिष्ठित टालिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन देशों और संस्कृतियों के बीच आपसी समझ को मजबूत करते हैं। उत्सव की मूल भावना को रेखांकित करते हुए SIFFCY के चेयरमैन एवं स्माइल फाउंडेशन के सह-संस्थापक श्री संतanu मिश्रा ने कहा कि बचपन वह अवस्था है जहां मूल्य और दृष्टिकोण विकसित होते हैं, और सिनेमा सहानुभूति व सामाजिक चेतना को पोषित करने का एक सशक्त माध्यम है। वहीं SIFFCY के फेस्टिवल डायरेक्टर और CIFEJ UNICEF (2025–27) के अध्यक्ष श्री जितेंद्र मिश्रा ने कहा कि SIFFCY दुनिया भर की कहानियों को एक साझा सांस्कृतिक मंच पर लाता है, जहां युवा दर्शक विविधता, रचनात्मकता और वैश्विक दृष्टिकोण को समझ पाते हैं।
स्माइल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल फॉर चिल्ड्रन एंड यूथ (SIFFCY) का 12वां संस्करण, स्माइल फाउंडेशन की एक पहल है, जो 28 जनवरी से 3 फरवरी 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। यह महोत्सव दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (DEPwD), सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार तथा भारत में यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। हाइब्रिड प्रारूप में आयोजित इस महोत्सव में पीएचडी हाउस, सिरी इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली में फिल्म प्रदर्शन, कार्यशालाएं, पैनल चर्चाएं और पुरस्कार समारोह शामिल हैं, साथ ही देशभर के 100 से अधिक स्थानों पर स्कूलों और सामुदायिक केंद्रों में आउटरीच स्क्रीनिंग भी की जा रही है। उत्सव का एक चयनित कार्यक्रम सुरक्षित, जियो-ब्लॉक्ड वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध है, जिससे देशभर में पहुंच सुनिश्चित हो सके। गैर-लाभकारी, गैर-टिकटेड और पूर्णतः सुलभ इस महोत्सव में 35 से अधिक देशों की 150 से ज्यादा फिल्में प्रदर्शित की जा रही हैं, जिनमें पोलैंड और नीदरलैंड्स पर विशेष फोकस है। कार्यक्रम में ECFA अवॉर्ड, CIFEJ अवॉर्ड और फिल्म क्रिटिक्स सर्कल ऑफ इंडिया (FCCI) अवॉर्ड जैसे प्रतिष्ठित सम्मान भी शामिल हैं।





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