प्रदूषण कम करने में किसानो का बड़ा योगदान होगा : बंकरमैन श्रीपाल

शब्दवाणी सम्माचार टीवी, बुधवार 31 दिसंबर 2025 (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। ईश्वर ने हमें इस पृथ्वी पर एक साफ़-सुथरा वायुमंडल बनाकर दिया जिसमे नाइट्रोजन (N2) 78%, ऑक्सीजन (O2) 21%, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) 0.03%, अन्य गैसें (जैसे नियॉन, हीलियम, मीथेन, हाइड्रोजन, आदि जो बहुत कम मात्रा में होती हैं), उपस्थित थीं जिसके कारण पृथ्वी पर जीवन सम्भव हो सका। परन्तु जब जीवन आया तो हमने इस पृथ्वी के वायुमंडल को गन्दा अर्थात प्रदूषित करना शुरू कर दिया। फिर भी ईश्वर ने वायुमंडल को लाखों वर्षों तक साफ़-सुथरा बनाये रखने के लिए संतुलन बनाये रखा हुआ था। वर्ष 1776 के बाद जब हम विकास की तरफ बढे  तब जीवन में उद्योगीकरण किया, परिवहन व्यवस्था बनायी, प्राकृतिक जंगलो से कंक्रीट के जंगल बनाने शुरू किये और वातानुकूलित घर, ऑफिस व वाहन बनाने शुरू किये, ऊँची-ऊँची भवन का निर्माण शुरू किया, दूर-दूर तक घनी आबादी वाला कॉलोनी बनाना शुरू किया जिससे प्रकृति को अपने वायुमंडल को साफ़-सुथरा करने में ज्यादा प्रयास करना पड़ने लगा। फिर भी प्रकृति ने कई सदियों  तक कार्बन डाइआक्साइड को 300-400 पीपीएम तक सीमित रखकर हमारे वायुमंडल को जीवन लायक बनाये रखा। लेकिन जब हमारी जनसंख्या और भी तेजी से बढ़ने लगी तो हम अपने रहने के लिए बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगल बनाने लगे और साथ ही बड़े-बड़े उधोग लगाने लगे, तेज परिवहन व्यवस्था करने लगे और जरूरत से ज्यादा वातानुकूलित जीवन जीने लगे। ऊपर से हम विकास के नाम पर प्राकृतिक जंगल, खेत-खलियान, पेड़-पौधें को बगैर सोचे समझे खत्म करके कन्क्रीट के जंगलों मे परिवर्तित करने लगे। और अब तो हद यहां तक हो गयी है कि कुछ इलाकों मे तो दूर-दूर तक जंगल, खेत-खलियान, पेड़-पौधें नज़र ही नही आते। अगर कहीं जंगल, खेत-खलियान, पेड़-पौधें नज़र आ भी रहे हैं तो वो अपने वास्तविक रंगों में नहीं हैं क्योंकि उनके ऊपर पड़े धूल और बदलते मौसम की मार के कारण उनका रंग भी बदल गया है।  अब हम धूल, ग्लोबल वार्मिंग और बदलते मौसम के कारण बदले हुए रंग को ही पेड़ पोधों का वास्तविक रंग समझने लगे हैं। 

परन्तु अब यह भी समझना होगा अब उपरोक्त कारणों से हमारे जंगल, खेत-खलियान और पेड़-पोधों की कार्बन डाइआक्साइड सोखने की क्षमता भी दिन प्रतिदिन काम होती जा रही हैं। जब हम अपने विकास के नाम पर प्रकृति और उसके वायुमंडल के साथ छेड़-छाड़ करके जो उसका नुक्सान कर रहे हैं तो उसको ठीक करने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होनी चाहिए। नहीं तो जल्द ही पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाइआक्साइड का स्तर 1000 पीपीएम को पार कर जाएगा, जिसके कारण पहले तो भवनों मे जागे सभी वातानुकूलन संयंत्र फेल हो जाएंगे और फिर कुछ ही दसकों मे जब वातावरण मे कार्बन डाइआक्साइड का ये स्तर 5000 पीपीएम तक पहुँच जाएगा तो पृथ्वी पर सिर्फ मानव जीवन ही नहीं बल्कि सभी जीव जंतुओं का जीवन भी नष्ट हो जाएगा। क्योंकि वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि ऐसी हालत मे ऑक्सीजन की कमी के कारण मानव शरीर मे ऐंठन, कोमा और मृत्यु भी हो सकती है। फिर हम मे से कुछ लोग बचें भी तो शायद हम यही कहेंगे कि कयामत आ गयी है। यह कयामत ना आये इसलिए आज ही से हमे ठोस कदम उठाने  होंगे क्योंकि अब दिल्ली जैसे कई शहरों मे कुछ जगहों पर वायुमंडल मे कार्बन डाइआक्साइड का ये स्तर 300 पीपीएम से बढ़कर 600, 700, 800, 900 व 1000 पीपीएम तक पाया गया है, जो कि भविष्य मे आने वाले एक बहुत ही बड़े खतरे की चेतावनी दे रहा है। इसी के कारण अब हमारे देश मे कुछ वर्ष पहले डिजाइन किये हुए वातानुकूलन संयत्र फेल होने लगे हैं। क्योंकि वे अब वातावरण मे इस बढ़ते हुए कार्बन डाइआक्साइड स्तर के कारण इन भवनों को इंडियन स्टैंडर्ड्स (आई एस 15879-2009), इंडियन सोसाइटी ऑफ हीटींग, रेफ़रीजरेटिंग व एयर कन्डिशनिंग इंजिनीयर्स (ISHRAE) व अमेरिकन सोसाइटी ऑफ हीटींग, रेफ़रीजरेटिंग व एयर कन्डिशनिंग इंजिनीयर्स (ASHRAE) के द्वारा तय किये गये माप दंडों के मुताबिक (500 पीपीएम  व 1000 पीपीएम से कम कार्बन डाइआक्साइड वाली) अंदरूनी हवा नही दे पा रहे हैं। अगर ये सिलसिला अब कुछ और वर्षों तक इसी तरह चलने दिया गया तो अब वो दिन दूर नही जब शीघ्र ही हमे दुनिया की तबाही का वो मंजर देखने को मिले जिसमे इस पृथ्वी पर जीवन पूर्णतया नष्ट हो जाएगा।

वायुमंडल के विशेषज्ञ बंकरमैन मेजर जनरल डॉक्टर श्रीपाल ने बताया कि इस पृथ्वी के वायुमंडल को बचाने के लिए जंगल, खेत-खलियान, पेड़-पौधों के साथ-साथ इसका वैकल्पिक उपाय बंकरमैन टेक्नोलॉजी है। इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने से हम घरों के अंदर और बाहर दोनों जगह कार्बनडाइआक्साइड का स्तर नियंत्रित कर सकते हैं। अच्छी सेहत के लिए घरों के अंदर कार्बनडाइआक्साइड का स्तर 300 से 500 पीपीएम और 500 से 800 पीपीएम के बीच आसानी से रखा जा सकता है। घर के बाहर के वातावरण मे भी इस टेक्नॉलजी से कार्बनडाइआक्साइड का स्तर 400 पीपीएम (0.04%) से कम हमेशा के लिए रखा जा सकता है, जिससे आने वाले समय मे भी हमारे सभी वातानुकूलन संयंत्र ठीक तरह से काम करते रहें और पृथ्वी पर इस बढ़ती हुई ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की समस्या से भी हमे हमेशा के लिए छुटकारा मिल सके। 

डॉ श्रीपाल ने यह भी बताया कि कार्बनडाइआक्साइड रिमूवल टेक्नॉलजी का इस्तेमाल अभी तक सिर्फ तीन जगह ही किया जाता था स्पेस मिशन मे, समुद्र मे पानी के नीचे चलने वाली पनडुब्बियों और जमीन के बहुत नीचे बनाये जाने वाले न्यूक्लीयर बँकरों मे। इसीलिए यह टेक्नोलॉजी अभी तक बहुत महंगी थी जिसके कारण इसका इस्तेमाल आम जगहों पर नहीं होता था।  परन्तु बंकरमैन टेक्नोलॉजी जिसको खुद बंकरमैन मेजर जनरल डॉक्टर श्रीपाल ने अपने अथक प्रयासों से बनाया है। विदेशो से इम्पोर्ट की जाने वाली टेक्नॉलजी से भी करीब 10 गुणा ज्यादा असरदार है और इसकी कीमत भी विदेशी तकनीक के मुकाबले बहुत ही कम है। वो भी इसका इस्तेमाल वातानुकूलन संयंत्रों के साथ करने से बिजली सहित अन्य खर्चे कम होने के कारण यह बंकरमैन टेक्नोलॉजी भारत मे सिर्फ जीरो कॉस्ट में ही नही बल्कि नेगटिव कोस्ट मे पड़ रही है। बंकरमैन टेक्नोलॉजी को सरकार अगर किसान की पीएम कुसुम योजना और आम लोगों की पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के अंतर्गत सोलर पेनल के साथ बंकरमैन टेक्नोलॉजी पर सब्सिडरी दे तो किसान और आम जनता मिलकर प्रदूषण मुक्त बिजली के साथ-साथ CO₂, PM₂.₅, PM₁₀, TVOC जैसी गैसों को वातावरण से सोखकर घर और बाहर के वायुमंडल को साफ़ कर सकेंगे। क्योंकि बंकरमैन टेक्नोलॉजी CO₂, PM₂.₅, PM₁₀, TVOC व अन्य विषैली गैसों को अपने फिलटरो मे सोखकर उनसे जैविक खाद (मिनेरल्स रिच ऑर्गैनिक मेन्योर) बनाता है, जो कि किसान कि फसलों और पेड़ पोधों की उत्पादन क्षमता को बढ़ाता है। इस से पेड़ पोधों की आक्सिजन बनाने की क्षमता भी बढ़ेगी और खाद्य उत्पादन मे भी बढ़ोतरी होगी। इस योजना से किसान कार्बन क्रेडिट कमाकर अपनी वार्षिक आय मे भी बदोतरी कर सकेंगे। इस तरह भारत के किसान वातावरण को शुद्ध करने मे एक बहुत बड़ा योगदान कर सकेंगे, जिसकी देश मे इस वक्त बहुत ही ज्यादा जरूरत है।

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