सुनो सरकार उसकी गली में कितने कुत्ते?
अब बताएंगे डॉक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर, बैरिस्टर बनाने वाले अध्यापक
शब्दवाणी सम्माचार टीवी, वीरवार 1 जनवरी 2026, लेखक ललिता अध्यापक एवं अध्यक्ष, प्रगतिशील शिक्षक न्याय मंच महिला मोर्चा, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, चाणक्य की धरती के शिक्षक अब कुत्तों के खानदान को गली-गली, घूम घूम, कलम से कागज पर उतार सरकार के पास भेजेंगे। सरकार के लिए कुकुर गणना एक महत्वपूर्ण,समझदारी, जिम्मेदारी,होशियारी भारत भविष्य निर्माण विकास की बुनियाद का महत्वपूर्ण काम प्रतीत हो रहा है। जिसे आर्यव्रत भारतखंड मे शिक्षकों के अलावा इस राष्ट्र निर्माण के बेहद असरदार श्वान गिनती के अस्मिता से परिपूर्ण कार्य को बेहतर तरीके से कर ही नहीं सकता। कुत्तों के नवजात पिल्लो समेत पूरा कुत्ता परिवार को कोई और गिनेगा तो चूक होने की प्रबल सम्भावना बरकरार है, और एक भी कुत्ता छूट गया तो सुरक्षा चक्र टूट गया। अध्यापक की इस दुर्दशा पर आसू बहाऊं,रुदन, करंदन, विलाप करूं या उत्सव की आतिशबाजी से पूरा आसमान जगमग कर दूं कि जिस महान मनोरथ के लिए मैं गुरुजनों की राह पर चल गुरु की गरिमा हासिल की वह करोड़ो साल की गुरु परम्परा मे करने वाले हम बन ही गये। वो परम सफलता आज मेरे कदमों को चूम इठला खिलखिला रही है।
मैं दुनिया के सभी देशों को चिल्ला चिल्ला कर कह सकता हूं मैं हूं कुत्ता गिनने वाला महान शिक्षक है कोई चीन जापान रसिया में जिसे हम जैसे कुत्ता गिनने की कला आती हो,हमारी इस अद्वितीय, अनुपम अद्भुत कला की काबिलियत को देख निसंदेह फ्रांस अमेरिका फिनलैंड के अध्यापकों के सर शर्म से झुक जाएंगे। आखिरकार करोडो वर्ष के गुरु परम्परा मे वो दिन आ ही गया जो पहले कभी नहीं आया। शिक्षक और शिक्षा आज जिस मुकाम पर हैं यह शिक्षकों के लिए डॉग काउंटिंग के लिखित सरकारी आदेश के बाद स्पष्ट हो ही जाता है। आज राष्ट्र निर्माण मे युवाओ के भविष्य निर्माण से ज्यादा आवश्यक है कुत्तों का कुनबा कहाँ क्यों बढ़ रहा है, घट रहा है, हट रहा है, या पलायन कर रहा है या कुत्तों के घर में खुशखबरी आने वाली है। इस पर अध्यापकों की पैनी नजर नहीं होगी तो मानो आसमान टूट पड़ेगा, धरती हिल जाएगी, तूफान तबाही मचा देगा, इस श्वान गणना का मुखिया मास्टर को बना सरकार ने बता और जता ही दिया कि आपकी पढ़ाई लिखाई बड़े-बड़े परीक्षा पास करके पाई और कमाई नौकरी का इससे बड़ा इनाम कोई मिल ही नहीं सकता इससे बड़ी उपाधि अध्यापकों के हिस्से कोई आ ही नहीं सकती।
चाक ब्लैक बोर्ड पर पाइथागोरस की थ्योरी,अमीबा की संरचना, कालिदास का शाकुंतलम, h2o की प्रक्रिया, मुंशी प्रेमचंद की कहानी और कबीर दास के दोहों के अर्थ समझने वाले अध्यापक साथी धारीदार, चितकबरा, लाल मुंह,सफेद पूछ, निराकाला, निरासफेद, पैरों पर निशान वाला, लंगड़ा, बोना, मोटा, गठीला, नाटा, पांगू इन भांति भांति के कुत्ते किस गली में कितनी संख्या में मौजूद है और कहां तक उनकी पहुंच है। यह सब जानना समझना और दर्ज करना अध्यापकों के लिए सरकारी फरमान से अनिवार्य हो गया है। हम अध्यापक है साहबे हम मजबूर मजदूर है। सड़क पर चालान काटने की तैनाती,कोरोना काल में हमारे सैकड़ो साथियों ने क्वॉरेंटाइन मरीजों की देख रेख की ज़िम्मेदारी संभाली,राशन बांटा और सैकड़ो साथियो ने अपनी जान गवा दी। बीएलओ को ड्यूटी में हम इतने मजबूर कर दिए जाते हैं की फांसी का फंदा आसान लगने लगता है। चुनाव की लिस्ट बनाते है,चुनाव करवाते हैं,हम बच्चों को घर-घर ढूंढने जाते हैं, उनके बैंक खाता खुलवाते है, अपनी तनख्वाह बिल खुद बनाते हैं पास करवाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटते हैं। ऐसे ही 122 अनचाहे काम हम अध्यापक शान सम्मान स्वाभिमान के साथ सर उठाकर कर ही रहे है।
इसमें नया कारनामा कुत्तों के परिवार का आंकड़ा जुटाना शामिल कर सरकार ने जो हम पर उपकार किया है, वह अध्यापकों के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा जाने लायक आदेश प्रतीत होता है। हम कब पढ़ाएंगे बच्चे? कैसे आएंगे बेहतर परिणाम? कैसे बनेंगे हमारे शिक्षार्थी डॉक्टर कलेक्टर बैरिस्टर इंजीनियर इस पर ध्यान कैसे केंद्रित करेंगे? जब हमारे ही बच्चे हमसे पूछेंगे बताओ मास्टर जी मेरी गली में कितने कुत्ते? कितनी कुतिया? कितने पिल्ले तो क्या जबाव दूंगा? मै शिक्षक हूं शर्मिंदा हूं नौकरी परिवार पालने और पेट भरने के लिए मजबूर तो करती है पर इतना करेगी काश मास्टर बनने से पहले मालुम होता। साहब इस मजबूरी में सरकार हमसे कुत्ता गिनवाये या चूहा बिल्ली नौकर है तो करेंगे ही, करते ही रहेंगे, करना ही पड़ेगा और करना भी चाहिए सर झुका कर बिना सवाल किये। मैं उनसे माफी मांगता हूं जिन्होंने यह लिखा था कि गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पाँव, बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताय। यह दोहा आज अपने मायने खो चुका मालुम होता है, अध्यापक भगवान बताने वाला नहीं अब कुत्ता बताने वाला बन गया है। सच्चाई तो यह है कलुआ चितकबरा भूरिया तीनों खड़े एक साथ सबके तीन चार पिल्लै मिले है गिनती हमारे हाथ। अध्यापकों पर दया करो अध्यापकों को अध्यापन कराने दो सरकार और सोचना होगा देश के प्रबुद्ध नागरिको को भी ।





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