फोर्टिस एस्कॉर्ट्स ओखला में एडवांस बोन कैंसर ग्रस्त 11-वर्षीय मरीज की हुई सर्जरी
शब्दवाणी सम्माचार टीवी, रविवार 8 फरवरी 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। यह साहस और उम्मीद की ऐसी कहानी है जिसमें एक बच्ची और मां ने हालात के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया। फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पीटल, ओखला के डॉक्टरों ने इस 11-वर्षीय बच्ची का जिसके बाएं पैर में स्टेज IV का बोन कैंसर फैल चुका था और उसने दोनों फेफड़ों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया था सफल उपचार कर इस मामले से उपजे डर, अनिश्चितता और निराशा के भाव को पूरी तरह से दूर कर दिया है।
इस जटिल और भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण मामले का प्रबंधन डॉ अर्चित पंडित, डायरेक्टर एंड हेड ऑफ डिपार्टमेंट, सर्जिकल ओंकोलॉजी के नेतृत्व में एक समर्पित मल्टीडिसीप्लीनरी टीम ने डॉ विनीत गोयल, कंसल्टेंट, सर्जिकल ओंकोलॉजी, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पीटल, ओखला के साथ मिलकर किया। इस बच्ची को जब उपचार के लिए फोर्टिस एस्कॉर्ट्स ओखला लाया गया तो वह चलने में असमर्थ थी और उसका बचपन अचानक ही दर्द, बार-बार अस्पतालों के चक्कर काटने, तथा डर से सहमते हुए बीत रहा था। वह अपने पैर में मैलिग्नेंट बोन ट्यूमर की वजह से व्हीलचेयर और बैसाखियों पर निर्भर थी और इस बीमारी ने उसे न सिर्फ थका दिया था बल्कि काफी तोड़ भी दिया था। मरीज के परिवार को पहले यह बताया गया था कि ऐसे में पैर काटना ही जीवनरक्षा का एकमात्र समाधान था, जिसे सुनकर बच्ची और उसकी मां पूरी तरह से बिखर गए थे।
लेकिन फोर्टिस की टीम ने पैर काटने को इलाज के रूप में स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया और मरीज का पैर बचाने के लिए अधिक एडवांस तकनीक का सहारा लिया जिससे बच्ची का आत्मसम्मान, मोबिलिटी और उसका भविष्य सभी सुरक्षित हो सकें। अस्पताल की अत्यंत कुशल मल्टीडिसीप्लीनरी टीम की देखभाल में, जिसमें ऑर्थोपिडिक ओंकोलॉजी स्पेश्यलिस्ट शामिल थे, इस बच्ची की लिंब कंज़र्वेशन सर्जरी की गई और उसके पैर को कटने से बचा लिया गया। इस सर्जरी में कैंसर से प्रभावित हड्डी को हटाया गया और उसे रीकंस्ट्रक्ट किया गया, जिसने धीरे-धीरे मरीज को रिकवरी के साथ-साथ नए विश्वास से भी भर दिया।
लेकिन अभी मेडिकल दृष्टि से चुनौतियां समाप्त नहीं हुई थी। यह कैंसर चुपचाप मरीज की हड्डी से होते हुए फेफड़े तक में फैल चुका था, और इसके उपचार के लिए काफी आक्रामक तरीके से इलाज की आवश्यकता थी। इसके लिए मरीज को कीमोथेरेपी और अलग-अलग चरणों में लंग सर्जरी से गुजरना पड़ा। बोन सर्जरी के कुछ महीनों बाद बाएं फेफड़े की मेटास्टेसेक्टॉमी की गई, और इसके बाद दाएं फेफड़े को भी इसी प्रक्रिया से गुजारा गया और इस दौरान कई स्थानों से ट्यूमर को हटाया गया।
ये प्रक्रियाएं मिनीमॅली इन्वेसिव रोबोटिक एवं वीडियो-एसिस्टेड थोरोस्कोपिक सर्जरी तकनीकों की मदद से की गईं जिसका एक बड़ा फायदा यह होता है कि मरीज को कम शारीरिक ट्रॉमा से गुजरना पड़ता है और रिकवरी भी तेजी से होती है। इस 11-वर्षीय मरीज ने अस्पतालों में इलाज के लिए रुकने, कीमोथेरेपी प्रक्रियाओं और तीन बड़ी सर्जरी के बावजूद साहस का परिचय दिया वह अक्सर इलाज से थकी रहती थी, कई बार डर भी जाया करती थी, लेकिन इस पूरे सफर में उसकी मां लगातार साथ बनी रहीं, उसकी हर हार में और हर छोटी से छोटी जीत में मां उसका ढांढस बढ़ाने के लिए मौजूद रहीं थीं।
इस मामले की और अधिक जानकारी देते हुए डॉ अर्चित पंडित, डायरेक्टर एंड हेड ऑफ डिपार्टमेंट, सर्जिकल ओंकोलॉजी ने कहा सर्जिकल ओंकोलॉजी में प्रगति, प्रिसीजन कीमोथेरेपी और मिनीमॅली इन्वेसिव लंग सर्जरी ऐसी उपचार प्रक्रियाएं हैं जो एडवांस कैंसर ग्रस्त बच्चों के क्लीनिकल परिणामों को बदलकर रख देती हैं, बशर्ते उपचार समय पर मिले और विस्तृत हो। उपचार के बाद, आज यह बच्ची बिना किसी सहारे के स्वयं चलने-फिरने में सक्षम है, वह कैंसर-मुक्त हो चुकी है और स्वास्थ्य लाभ कर रही थी यह परिणाम इस शक्तिशाली संदेश से कम नहीं है कि स्टेज IV के लंग कैंसर का, जो कि फेफड़ों तक फैल चुका हो, सर्जरी और कीमोथेरेपी के मेल से उपचार संभव है। इस मरीज की कहानी उन सभी परिवारों के लिए आशा की किरण है जो एडवांस चाइल्डहुड कैंसर का सामना कर रहे हैं। इसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि स्टेज IV जिंदगी की डगर के समाप्त हो जाने का ऐलान नहीं है, और यह भी की पैर को बचाया जा सकता है, उपचार lहो सकता है और जीवन की गुणवत्ता को बहाल किया जा सकता है। इसके लिए मेडिकल विशेषज्ञता और दक्षता तथा सपोर्ट का उचित मेल जरूरी है।
डॉ विनीत गोयल, कंसल्टेंट, सर्जिकल ओंकोलॉजी, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स, ओखला ने कहा जब यह बच्ची पहली बार हमारे पास आयी थी, तो काफी री हुई थी, वह दर्द से भी जूझ रही थी और चलने में अक्षम थी। कैंसर के इलाज के अलावा हमारे ऊपर उसका बचपन सुरक्षित करने और उसका भविष्य बचाने की जिम्मेदारी भी थी। पैर काटने की बजाय पैर को सुरक्षित बचाने के विकल्प को चुनने से यह बच्ची दोबारा चलने-फिरने, दौड़ने और आजीवन विकलांगता की बजाय आत्मनिर्भरता के साथ जीने लायक हो चुकी है। इस मरीज को अपने आप बिना किसी सहारे के चलते हुए देखना हमारे लिए काफी सुखद है यह अहसास केवल डॉक्टरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि उनक सभी के लिए है जो यह मानते रहे थे कि साहस, विज्ञान और दयाभाव इस मरीज की पूरी कहानी को बदल सकते हैं। मरीज के इस सफर का एक महत्वपूर्ण और बेहद प्रभावी पहलू उसकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से जुड़ा है। त्रेहन बिल्डर्स के श्री अमन त्रेहन और श्री अभिषेक त्रेहन ने इस बच्ची के परिवार को इलाज के लिए सपोर्ट किया और तभी इलाज मुमकिन हो पाया। उनके सपोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि मरीज की तीनों सर्जरी और उपचार बिना किसी रुकावट के पूरा हो इस मामले ने एक बार फिर कार्पोरेट सामाजिक दायित्वों के महत्वपूर्ण रोल को भी रेखांकित किया है, जो कि लोगों की जिंदगियां भी बचा सकते हैं।



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें