फिल्म समीक्षा : इक्कीस (एक शहादत की कहानी)
शब्दवाणी सम्माचार टीवी, शुक्रवार 2 जनवरी 2026, फिल्म समीक्षक : रेहाना परवीन (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। फिल्म इक्कीस जो सिनेमाघरों में 1 जनवरी 2026 को प्रदर्शित हुई है। फिल्म इक्कीस सोमवार 29 दिसम्बर 2025 को विशेष प्रेस शो PVR सलेक्ट सिटी वॉक, दिल्ली में मुझे देखने का अवसर मिला। फिल्म इक्कीस में अगस्त्य नंदा (अमिताभ बच्चन का नाती), धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया, इत्यादि मुख्य कलाकार हैं। फिल्म इक्कीस को श्रीराम राघवन देवेंद्र मालवीय द्वारा निर्देशित और दिनेश विजन और बिन्नी पड्डा द्वारा निर्मित यह फिल्म जिसे मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले बनाया गया है। यह फिल्म 21 साल की उम्र में परमवीर चक्र पाने वाले कैप्टन अरुण खेतरपाल जो 1971 के भारत-पाक युद्ध के नायक की वीरगाथा पर आधारित है। फिल्म को सेंसर बोर्ड से U/A प्रमाण-पत्र मिला है, जिसका मतलब है कि यह फिल्म 13 साल और उससे ऊपर के बच्चे अपने माता-पिता के मार्गदर्शन में देख सकते हैं। सेंसर बोर्ड ने कुछ बदलावों के साथ इसे पास किया है, जिसमें भारत-पाकिस्तान से जुड़ा एक 15 सेकंड का डायलॉग हटाने का निर्देश भी शामिल है। फिल्म की अवधि लगभग 2 घंटे 36 मिनट है। फिल्म इक्कीस 2025 में बनी भारतीय हिंदी भाषा की देश भक्ति और देश पर कुर्वान होने की भावना पर फिल्म है।
कुछ फिल्में तालियाँ बटोरती हैं, कुछ नारे लगवाती हैं और कुछ ऐसी भी होती हैं जो दर्शक को चुप करा देती हैं। फिल्म इक्कीस चुप कराने वाली तीसरी श्रेणी की फिल्म है। यह वह अनुभव है जिसके बाद आप थिएटर से बाहर निकलते समय बोलना नहीं चाहते क्योंकि गले में भावनाओं का भार होता है, शब्दों का नहीं। फिल्म इक्कीस में धर्मेंद्र का अभिनय किसी संवाद पर निर्भर नहीं है उनकी आंखों की नमी आवाज़ की थरथराहट और मौन ही सब कुछ कह देता है। यह उनके करियर की सबसे संवेदनशील प्रस्तुतियों में से एक हो सकती है। जयदीप अहलावत एक ऐसे पाकिस्तानी सेना अधिकारी के रूप में सामने आते हैं जो दुश्मन होते हुए भी शौर्य का सम्मान करना जानता है। दोनों के बीच के दृश्य खासकर अंतिम हिस्से में फिल्म को साधारण युद्ध कथा से ऊपर उठा देते हैं। अगस्त्य नंदा शारीरिक रूप से भूमिका के अनुरूप हैं और उनकी गंभीरता विश्वसनीय लगती है लेकिन भावनात्मक स्तर पर उनका अभिनय सीमित रह जाता है। शहादत के भीतर चल रही उथल-पुथल को वे पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाते। सिमर भाटिया अपने पहले ही प्रयास में संयमित और सहज लगती हैं। उनका किरदार शोर नहीं मचाता लेकिन अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है।
फिल्म में असरानी भी नज़र आते है शायद धर्मेंद्र और असरानी दोनों जोड़ी की यह अंतिम फिल्म भी हो सकती है। तनुज टिकू और केतन सोढ़ा का बैकग्राउंड स्कोर भावनाओं को बिना दबाव बनाए उभारता है। युद्ध दृश्य वास्तविक लगते हैं बिना अनावश्यक नाटकीयता के। श्रीराम राघवन यहां अपने सिग्नेचर सस्पेंस से हटकर एक संयमित और गंभीर भाषा चुनते हैं। कई दृश्य बेहद असरदार हैं जैसे टैंक के पेरिस्कोप से झांकता चेहरा, जो एक पल के लिए इतिहास को जीवित कर देता है। हालांकि फिल्म की संरचना पूरी तरह संतुलित नहीं है। शुरुआती हिस्से में फ्लैशबैक का प्रवाह थोड़ा बिखरा हुआ लगता है और प्रशिक्षण के दृश्य अपेक्षित भावनात्मक गहराई नहीं बना पाते। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म अपने दूसरे हिस्से में प्रवेश करती है उसका स्वर बदल जाता है और यहीं से इक्कीस सच में पकड़ बनाती है।
फिल्म की कहानी में फिल्म दो समय-रेखाओं में आगे बढ़ती है। एक ओर 1971 का भारत-पाक युद्ध जहाँ युवा टैंक कमांडर अरुण खेतरपाल (अगस्त्य नंदा) मोर्चे पर डटे हैं। दूसरी ओर कारगिल युद्ध के बाद का दौर जहाँ उनके पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेतरपाल (धर्मेंद्र) वर्षों बाद पाकिस्तान जाते हैं एक कॉलेज रियूनियन के बहाने लेकिन असल में अतीत से सामना करने अपने गाँव जाते हैं। पाकिस्तानी सेना अधिकारी ब्रिगेडियर नसीर (जयदीप अहलावत) की मेज़बानी में यह मुलाक़ात धीरे-धीरे एक ऐसे सच की ओर बढ़ती है, जिसे कोई ज़ोर से कहना नहीं चाहता। कहानी का असली असर इसी टकराव में छुपा है युद्ध के बाद की चुप्पी में।
आज की अधिकतर युद्ध फिल्में जहां आक्रामक राष्ट्रवाद का रास्ता चुनती हैं इक्कीस एक कठिन लेकिन ईमानदार विकल्प अपनाती है। यह फिल्म यह स्वीकार करती है कि युद्ध में सम्मान हो सकता है, भले ही सीमाएं अलग हों। यह विचार हर दर्शक को सहज नहीं लगेगा, और शायद फिल्म भी इस असहजता को जानती है इसीलिए अंत में एक स्पष्ट संदेश देती है ताकि भावनाओं को गलत दिशा न मिले। फिल्म इक्कीस जीत नहीं एक स्मरण है। यह फिल्म हमें यह नहीं बताती कि हम कितने शक्तिशाली हैं बल्कि यह याद दिलाती है कि हमारी आज़ादी की कीमत कितनी भारी रही है। इस फिल्म की पूरी कहानी आपको नहीं बता रही हूँ। फिल्म को आप अपने परिवार व् दोस्तों के साथ सिनेमाघरों में जाकर बडे पर्दे पर देखने का अलग मजा आएगा। मैँ इस फिल्म को आम दर्शकों के लिए पांच में से साढ़े तीन स्टार और देश भक्ति फिल्म सहित किसी महान किरदार पर आधारित फिल्म देखने वाले दर्शकों के लिए साढ़े चार स्टार देती हूँ।




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