मशीनी पेड़ से प्रदूषण नियंत्रण की नई स्वदेशी पहल

 

शब्दवाणी सम्माचार टीवी, शुक्रवार 6 फरवरी 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। वायु प्रदूषण आज देश-दुनिया के सामने एक गंभीर चुनौती बन चुका है। प्रदूषण को कम करने के लिए सरकारें और संस्थाएँ निरंतर प्रयासरत हैं, लेकिन अब तक स्थायी और व्यापक समाधान सामने नहीं आ पाया है। विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान परिस्थितियों में प्रदूषण को संतुलित करने के लिए प्रति व्यक्ति 131 से अधिक पेड़ लगाने की आवश्यकता बताई जाती है, जो स्थान और समय की सीमाओं के कारण व्यावहारिक रूप से कठिन है।

इसी चुनौती के समाधान की दिशा में भारत में स्वदेशी तकनीक से विकसित मशीनी पेड़ के रूप में बंकरमैन टेक्नोलॉजी अब बाज़ार में उपलब्ध है। इस प्रकार की तकनीक विश्व स्तर पर नई नहीं है जिन स्थानों पर प्राकृतिक पेड़ लगाना संभव नहीं होता, जैसे स्पेस मिशन, पनडुब्बियाँ एवं परमाणु पनडुब्बियाँ वहाँ ऐसी तकनीकों का उपयोग पहले से किया जाता रहा है। हालांकि अत्यधिक लागत के कारण यह तकनीक अब तक सीमित दायरे में ही थी। स्वदेशी विकास के कारण बंकरमैन टेक्नोलॉजी अब अधिक किफायती बन गई है और इसे घरों के भीतर तथा बाहरी वातावरण दोनों में प्रभावी रूप से स्थापित किया जा सकता है।

वायुमंडलीय विशेषज्ञ एवं बंकरमैन के मेजर जनरल डॉ. श्रीपाल के अनुसार, यह तकनीक मशीनी पेड़ की तरह कार्य करती है। यह प्राकृतिक पेड़ का विकल्प नहीं, बल्कि एक प्रभावी पूरक समाधान है। जहाँ एक प्राकृतिक पेड़ को पूर्ण विकसित होने में कम से कम पाँच वर्ष लगते हैं, वहीं बढ़ते शहरी प्रदूषण के बीच तत्काल समाधान की आवश्यकता है। यह मशीनी पेड़ CO₂ सहित विभिन्न प्रदूषणकारी गैसों को अवशोषित कर उन्हें संसाधित करता है तथा खनिज युक्त जैविक खाद (Minerals Rich Organic Manure) में परिवर्तित करता है, जिससे वातावरण को स्वच्छ बनाने में सहायता मिलती है।

जहाँ एक प्राकृतिक पेड़ के लिए जितनी जगह चाहिए, उतनी ही जगह में 50 या उससे अधिक मशीनी पेड़ स्थापित किए जा सकते हैं। प्राकृतिक पेड़ को कमरे के अंदर नहीं लगाया जा सकता, लेकिन यह तकनीक इनडोर उपयोग के लिए भी उपयुक्त है। कमरे के अंदर स्थापित करने पर यह 40 प्रतिशत से अधिक बिजली की बचत में भी सहायक हो सकती है। बंकरमैन टेक्नोलॉजी को DRDO, भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), IIT सहित कई सरकारी एवं शैक्षणिक संस्थानों से मान्यता प्राप्त होने का दावा किया गया है।

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