नारायणा हॉस्पिटल गुरुग्राम ने पर वेट लॉस क्लिनिक किया शुरू

शब्दवाणी सम्माचार टीवी, शनिवार 2 मई 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), गुरुग्राम। टापे का गहरा संबंध टाइप 2 डायबिटीज, फैटी लिवर डिज़ीज़ और हृदय रोगों जैसी स्थितियों से है। वजन प्रबंधन पृष्ठभूमि में, नारायणा हॉस्पिटल गुरुग्राम ने एक बहु-विषयक वेट लॉस क्लिनिक को कार्यान्वित किया है, जहां चिकित्सकीय, पोषण संबंधी, व्यवहारिक और प्रक्रियात्मक उपचार एक ही क्लिनिकल पाथवे के तहत उपलब्ध कराए जाते हैं। यह क्लिनिक डॉ. सुकृत सिंह सेठी, डायरेक्टर एवं सीनियर कंसल्टेंट, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के नेतृत्व में संचालित किया जा रहा है और इसमें गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, एंडोक्रिनोलॉजी, क्लिनिकल न्यूट्रिशन, साइकोलॉजी और बैरिएट्रिक सर्जरी की सेवाएं एकीकृत रूप से शामिल हैं। चिकित्सकों के अनुसार, इसका उद्देश्य उन मरीजों को दीर्घकालिक देखभाल प्रदान करना है, जिनकी वजन संबंधी समस्याएं मेटाबॉलिक गड़बड़ियों से जुड़ी होती हैं।

डॉ. सेठी ने कहा मोटापे में मेटाबॉलिज़्म, हार्मोन, गट फिज़ियोलॉजी और व्यवहार के बीच जटिल अंतःक्रियाएं शामिल होती हैं। इसका प्रभावी प्रबंधन अल्पकालिक या अलग-थलग उपायों के बजाय संरचित मूल्यांकन, उचित चिकित्सकीय हस्तक्षेप और निरंतर फॉलो-अप की मांग करता है। मरीजों का प्रारंभिक मूल्यांकन में बॉडी कंपोज़िशन एनालिसिस, मेटाबॉलिक जांच और जीवनशैली का आकलन शामिल होता है। प्रथम चरण के उपचार में डाइट प्लानिंग, शारीरिक गतिविधि के लिए मार्गदर्शन दिया  जाता है। जहां चिकित्सकीय रूप से आवश्यक हो, वहां फार्माकोलॉजिकल थेरेपी जैसे GLP-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट—को नियमित मॉनिटरिंग और बहु-विषयक निगरानी के साथ शामिल किया जाता है। फॉलो-अप शेड्यूल इस तरह से तैयार किए जाते हैं कि उपचार के प्रति प्रतिक्रिया का आकलन किया जा सके और आवश्यकता अनुसार बदलाव किए जा सकें। यह दृष्टिकोण मेटाबॉलिक मेडिसिन में उस व्यापक बदलाव को दर्शाता है, जिसमें व्यवहारिक रणनीतियों के साथ फार्माकोथेरेपी को नियंत्रित क्लिनिकल सेटिंग में जोड़ा जा रहा है। 

जिन मरीजों को नॉन-प्रोसीजरल प्रबंधन से पर्याप्त लाभ नहीं मिलता, उनके लिए क्लिनिक में मिनिमली इनवेसिव एंडोस्कोपिक प्रक्रियाएं उपलब्ध हैं। इनमें एंडोस्कोपिक स्लीव गैस्ट्रोप्लास्टी, इंट्रागैस्ट्रिक बैलून प्लेसमेंट और उन मरीजों के लिए एंडोस्कोपिक रिवीजन प्रक्रियाएं शामिल हैं, जिनमें पहले बैरिएट्रिक सर्जरी के बाद वजन दोबारा बढ़ गया हो। इन विकल्पों को अलग-अलग उपचार के रूप में नहीं, बल्कि निरंतर देखभाल की एक श्रृंखला के हिस्से के रूप में देखा जाता है। चिकित्सकों का कहना है कि भारत में मोटापा अब किसी एक सामाजिक-आर्थिक वर्ग तक सीमित नहीं रह गया है और यह तेजी से अन्य गैर-संचारी रोगों के साथ देखा जा रहा है। वहीं, अनियंत्रित और गैर-नियमित वेट-लॉस उत्पादों और उपायों की बढ़ती संख्या ने मरीजों की सुरक्षा और प्रमाण-आधारित उपचार को लेकर चुनौतियां भी पैदा की हैं। ऐसे परिदृश्य में, जहां वजन प्रबंधन को अक्सर प्रतिक्रियात्मक या अनियमित माध्यमों से अपनाया जाता है, यह क्लिनिक मोटापे को एक जटिल, दीर्घकालिक बीमारी के रूप में पहचान कर उसका उपचार करता है।

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