श्रम संकट या सिस्टम फेलियर? गौतम बुद्ध नगर से उठता बड़ा सवाल
150 करोड़ की आबादी के बावजूद उद्योगों में श्रमिकों की कमी, या फिर व्यवस्था में कहीं गहरी खामी?
शब्दवाणी सम्माचार टीवी, बुधवार 6 मई 2026, योगेश जगतरामका (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), गौतमबुद्ध नगर। भारत 150 करोड़ से अधिक आबादी वाला देश है, फिर भी आज उद्योग जगत, विशेषकर निर्माण क्षेत्र, एक ही सवाल बार-बार पूछ रहा है मजदूर कहाँ हैं? पहली नज़र में यह सवाल विरोधाभासी लगता है। जिस देश में इतनी बड़ी जनसंख्या हो, वहाँ श्रमिकों की कमी कैसे हो सकती है? लेकिन यदि हम इस प्रश्न को गहराई से देखें, तो स्पष्ट होता है कि समस्या मजदूरों की संख्या की नहीं, बल्कि श्रम व्यवस्था, उत्पादकता और कार्य संस्कृति की है। गौतम बुद्ध नगर, जिसे आज देश के सबसे तेज़ी से विकसित होते औद्योगिक और रियल एस्टेट केंद्रों में गिना जाता है इस चुनौती का एक जीवंत उदाहरण है। यहाँ का मॉडल लंबे समय से largely non-unionised labour system पर आधारित रहा है। सतह पर देखने पर सब कुछ व्यवस्थित लगता है काम चलता रहता है, प्रोजेक्ट आगे बढ़ते हैं और उद्योग की गति बनी रहती है। लेकिन इस चमक के पीछे एक ऐसी खामोशी भी है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
आज साइट्स पर लोग मौजूद हैं लेकिन कई बार अपेक्षित उत्पादकता दिखाई नहीं देती। दस लोगों का कार्य output कई बार पाँच लोगों के बराबर महसूस होता है। इसे केवल skill gap कहकर टालना आसान होगा, जबकि वास्तविकता इससे अधिक जटिल है। हमारे यहाँ अब भी कार्य को परिणाम के बजाय उपस्थिति और घंटों में मापा जाता है। efficiency, process discipline और accountability जैसी बातें अभी भी बड़े पैमाने पर कार्य संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाई हैं। अक्सर उद्योग जगत में यह सुनने को मिलता है कि मजदूरों में अब काम करने की इच्छा कम हो गई है। परंतु यह दृष्टिकोण अधूरा है। क्या मजदूर को समय पर भुगतान मिलता है? क्या उसे रहने की सम्मानजनक सुविधा, स्वास्थ्य सुरक्षा या भविष्य की कोई स्थिरता उपलब्ध है? यदि इन बुनियादी प्रश्नों का उत्तर संतोषजनक नहीं है, तो केवल यह कहना कि श्रमिकों में इच्छाशक्ति की कमी है, वास्तविक समस्या से बचने जैसा है। जहाँ सम्मान और सुरक्षा नहीं होती वहाँ लंबे समय तक समर्पण की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है।
यदि हम पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की तुलना करें, तो वहाँ मजबूत labour unions श्रमिकों को आवाज़ देते हैं, हालांकि कई बार इसके कारण उद्योग संचालन प्रभावित भी होता है। इसके विपरीत, गौतम बुद्ध नगर में unions की अनुपस्थिति ने उद्योग को flexibility तो दी है, लेकिन श्रमिकों की समस्याओं को largely silent बना दिया है। इस खामोशी को स्थिरता समझ लेना भूल होगी। यह एक दबा हुआ असंतोष भी हो सकता है, जो समय के साथ गहरा रूप ले सकता है। वास्तविक पीड़ा इससे भी अधिक मानवीय है। जो मजदूर इस शहर की इमारतों, फैक्ट्रियों और इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव तैयार करता है, वही अपने परिवार से दूर, अस्थायी परिस्थितियों में, सीमित सुरक्षा के साथ जीवन व्यतीत करता है। उसके लिए यह केवल रोजगार नहीं, बल्कि मजबूरी की अर्थव्यवस्था है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि आज का श्रमिक वैकल्पिक अवसरों की ओर आकर्षित हो रहा है चाहे वह गिग इकॉनमी हो, डिलीवरी सर्विसेज हों या छोटे स्तर का स्वतंत्र व्यापार। इन क्षेत्रों में उसे तत्काल आय अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता और कम अनिश्चितता दिखाई देती है।
इस बदलाव का सीधा प्रभाव निर्माण और औद्योगिक क्षेत्र पर पड़ रहा है। लेबर इंस्ताबिलिटी प्रोजेक्ट देलेस को बढ़ाती है, लागत में वृद्धि करती है और कई बार गुणवत्ता पर भी असर डालती है। इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि मजदूर कम क्यों हैं, बल्कि यह होना चाहिए कि हमारा सिस्टम श्रम को किस दृष्टि से देखता है। क्या श्रमिक केवल एक resource है, या विकास प्रक्रिया का वास्तविक भागीदार? भारत को आज केवल स्किल डेवलपमेंट की नहीं बल्कि वर्क कल्चर डेवलपमेंट की आवश्यकता है। एक ऐसी व्यवस्था की ज़रूरत है जहाँ श्रम को सम्मान मिले श्रमिक को सुरक्षा मिले और उद्योग को एक अधिक डिस्कॉपलीनेड प्रोडक्टिव एवं अक्कोउन्तेबले फ्रेमवर्क प्राप्त हो। गौतम बुद्ध नगर जैसे शहर, जो भारत के विकास के प्रतीक बन रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि यदि श्रम कमजोर है, तो विकास की नींव भी कमजोर है—और कमजोर नींव पर खड़ी कोई भी संरचना लंबे समय तक स्थायी नहीं हो सकती।





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