ऑटिज्म को समझने की जरूरत : डॉ. प्रियंका जैन भाभू

 विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस पर विशेष

शब्दवाणी सम्माचार टीवी, वीरवार 2 अप्रैल 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के अवसर पर CRIA की संस्थापक डॉ. प्रियंका जैन भाभू ने कहा कि ऑटिज्म से जुड़े बच्चों को परिवार, विद्यालय और समाज से समझ, स्वीकार्यता और सही सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि ऑटिज्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल अंतर है, जो बच्चे के संचार, व्यवहार और सामाजिक सहभागिता को प्रभावित करता है। यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि एक स्पेक्ट्रम है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक बच्चा अलग होता है और उसकी क्षमताएँ, चुनौतियाँ, संवेदी आवश्यकताएँ तथा सीखने का तरीका भी अलग हो सकता है। डॉ. भाभू ने कहा कि ऑटिज्म के संकेत अक्सर शुरुआती वर्षों में पहचाने जा सकते हैं। इनमें नाम पुकारने पर कम प्रतिक्रिया देना, सीमित नेत्र संपर्क, संचार में देरी, दोहराव वाले व्यवहार तथा सामाजिक मेलजोल में कम रुचि जैसे संकेत शामिल हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि समय पर पहचान होने से परिवार सही मार्गदर्शन और आवश्यक सहयोग प्राप्त कर सकते हैं।

एक सामान्य प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि ऑटिज्म को “ठीक करने” वाली सोच की आवश्यकता नहीं है। सही थेरेपी, विशेष रूप से ABA आधारित थेरेपी, उपयुक्त शिक्षा, उचित मार्गदर्शन और परिवार की मजबूत भागीदारी के साथ ऑटिज्म से जुड़े बच्चे सार्थक प्रगति कर सकते हैं और दैनिक जीवन में अधिक आत्मनिर्भर बन सकते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि बच्चे के विकास में परिवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। धैर्य, निरंतरता, समझदारी और घर का सकारात्मक वातावरण विकास की मजबूत नींव तैयार करता है। ऑटिज्म से जुड़े बच्चों को दया या निर्णय नहीं, बल्कि स्वीकार्यता, सम्मान और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है। आगे की दिशा पर बात करते हुए डॉ. प्रियंका जैन भाभू ने कहा कि समय पर पहचान, समयानुकूल वैज्ञानिक आधार वाली थेरेपी, और समाज में बढ़ी हुई जागरूकता, ऑटिज्म से जुड़े बच्चों के जीवन में बड़ा सकारात्मक बदलाव ला सकती है। उन्होंने कहा कि परिवार, विद्यालय और समुदाय मिलकर एक समावेशी वातावरण तैयार करें, ताकि हर बच्चे को समान अवसर मिल सके। अपने संदेश में उन्होंने लोगों से अपील की कि वे ऑटिज्म को संवेदनशीलता, समझ और मानवीय दृष्टि से देखें। उनका कहना था कि यदि बच्चे के आसपास का वातावरण सहयोगी और समावेशी हो, तो हर बच्चे को आगे बढ़ने और अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुँचने का बेहतर अवसर मिल सकता है।

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