भारत में क्रिप्टो विमर्श का बदलता स्वरूप
शब्दवाणी सम्माचार टीवी, मंगलवार 7 अप्रैल 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। भारत और क्रिप्टो परिसंपत्तियों का रिश्ता कभी सरल नहीं रहा है, लेकिन संसद में चल रही हालिया चर्चा यह दिखाती है कि अब यह विषय पहले से ज्यादा समझदारी के साथ उठाया जा रहा है। 2025 से लेकर 2026 की शुरुआत तक के सत्रों में यह बदलाव साफ नजर आता है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि वर्चुअल डिजिटल एसेट क्या है, बल्कि यह है कि पैसा कहाँ जा रहा है, इसमें कितनी पारदर्शिता है, और इसकी तकनीक आम लोगों के लिए कैसे काम आ सकती है। इससे यह संकेत मिलता है कि नीति अब ज्यादा व्यवस्थित और सख्त दिशा में बढ़ रही है, हालांकि यह देखना जरूरी होगा कि इस सख्ती के बीच नए प्रयोग और भागीदारी के लिए जगह बनी रहती है या नहीं। संसदीय चर्चाओं से सामने आए आंकड़ों में क्रिप्टो लेनदेन पर एकत्रित टीडीएस का राज्यवार डेटा खास ध्यान खींचता है। देशभर में यह संग्रह 2022-23 में लगभग 221 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 511 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया, जो इस क्षेत्र में बढ़ती गतिविधि को दिखाता है। इस कुल राशि में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 293.40 करोड़ रुपये रही, जिससे यह साफ होता है कि क्रिप्टो से जुड़ी गतिविधियाँ कुछ राज्यों में ज्यादा केंद्रित हैं। कर्नाटक में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जहां यह आंकड़ा करीब 39 करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 134 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
अगर राज्यों के हिसाब से देखें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है। दिल्ली में जहां 2023-24 में यह संग्रह एक करोड़ रुपये से भी कम था, वहीं अगले ही साल यह 28 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया, जो तेजी से बढ़ते बाजार की ओर इशारा करता है। दूसरी तरफ, तेलंगाना जो कि टेक हब राज्य हैं, वहां भी गिरावट दर्ज की गई और यह आंकड़ा एक करोड़ रुपये से ज्यादा से घटकर लगभग आठ लाख रुपये रह गया। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में यह आंकड़ा लगातार कम ही बना रहा और एक करोड़ रुपये के नीचे ही रहा। इन सभी आंकड़ों से यह समझ आता है कि बाजार बढ़ तो रहा है, लेकिन अभी पूरे देश में समान रूप से नहीं फैला है। सरकार की प्रतिक्रिया भी इस बदलाव के अनुसार साफ और सख्त रही है। वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत लाने से नियमों को लेकर जो भ्रम था, वह काफी हद तक खत्म हो गया है। इसके साथ ही, बिना पंजीकरण के काम कर रहे विदेशी एक्सचेंजों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए 52 ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स को नोटिस भेजे गए और उनकी सेवाओं को भारत में रोक दिया गया। प्रवर्तन निदेशालय ने भी इस दिशा में कार्रवाई करते हुए क्रिप्टो और ऑनलाइन धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में 6,242 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्तियां जब्त या संलग्न की हैं। इसके चलते कई गिरफ्तारियां हुई हैं और एक व्यक्ति को भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित किया गया है।
इसी के साथ, उपयोगकर्ताओं की पहचान से जुड़े नियम भी सख्त किए गए हैं। 2026 की शुरुआत से लागू नई केवाईसी प्रक्रिया के तहत अब प्लेटफॉर्म्स को लाइवनेस -डिटेक्टेड सेल्फी, समय के साथ जुड़ा हुआ जियो-टैग्ड लोकेशन डेटा और एक रुपये का बैंक सत्यापन करना जरूरी होगा। इसका मकसद गुमनाम लेनदेन को कम करना और सिस्टम को ज्यादा पारदर्शी बनाना है। साथ ही, देशभर में 13,800 से ज्यादा कानून प्रवर्तन कर्मियों को क्रिप्टो से जुड़े अपराधों की जांच के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया है, ताकि ऐसे मामलों को बेहतर तरीके से संभाला जा सके। ब्लॉकचेन तकनीक को लेकर भी सरकार का रुख पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। राष्ट्रीय ब्लॉकचेन फ्रेमवर्क के तहत इस तकनीक का उपयोग प्रशासन में बढ़ाने पर काम किया जा रहा है। महाराष्ट्र में ई-स्टांप सुरक्षा और मध्य प्रदेश में मोबाइल ऐप प्रमाणीकरण जैसे उदाहरण बताते हैं कि इसे जमीन पर लागू भी किया जा रहा है। इससे साफ होता है कि जहां एक ओर ट्रेडिंग पर निगरानी कड़ी की जा रही है, वहीं दूसरी ओर तकनीक के उपयोग को भी आगे बढ़ाया जा रहा है। हालिया संसदीय चर्चा यह दिखाती है कि सरकार अब इस क्षेत्र को लेकर ज्यादा स्पष्ट और सक्रिय हो गई है। ध्यान अब पैसे के प्रवाह पर नजर रखने, गलत गतिविधियों को रोकने और तकनीक के सही उपयोग पर है। अब सबसे अहम सवाल यह है कि क्या यह संतुलन भविष्य में इस क्षेत्र को आगे बढ़ने का मौका देगा, या ज्यादा सख्ती इसकी रफ्तार को धीमा कर देगी।





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