संगीतिका इंस्टीट्यूट ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स बना पुष्पों की वर्षा, भजनों से वृंदावन

शब्दवाणी सम्माचार टीवी, मंगलवार 3 मार्च 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। पूर्वी दिल्ली के कड़कड़डूमा स्थित संगीतिका इंस्टीट्यूट ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स में बीती शाम ऐसा प्रतीत हुआ मानो स्वयं वृंदावन का आनंदोत्सव धरती पर उतर आया हो। चारों ओर उड़ती पुष्प-पंखुड़ियाँ, भक्ति में झूमते सैकड़ों श्रद्धालु, गूंजते भजन और कथक की मोहक पदचाप इन सबने मिलकर एक ऐसी दिव्य संध्या का सृजन किया जिसे शब्दों में बाँध पाना कठिन है। भजन क्लबिंग एवं फूलों की होली” शीर्षक से आयोजित यह अद्वितीय आध्यात्मिक-सांस्कृतिक अनुभव प्राची & मोहन संकीर्तन द्वारा प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का आयोजन पद्मश्री सम्मानित, बनारस घराने की विश्वप्रसिद्ध कथक गुरुओं नलिनी अस्थाना एवं कमलिनी अस्थाना के दिव्य सान्निध्य में सम्पन्न हुआ।

जैसे ही संध्या का प्रारंभ हुआ, मृदंग की थाप और हारमोनियम की धुन के साथ वातावरण में भक्ति की तरंगें उठने लगीं। मंच पर आए सुप्रसिद्ध भजन गायक-गायिका प्राची अस्थाना और मदन मोहन और फिर जो आरम्भ हुआ वह केवल गायन नहीं, बल्कि एक सामूहिक साधना थी।

“साँसों की माला पे सिमरूँ मैं पी का नाम” की धीमी, गहरी और भावपूर्ण प्रस्तुति ने श्रोताओं के मन को भीतर तक छू लिया। अनेक आँखें बंद थीं, कई हाथ अपने आप जुड़ गए थे—और पूरा सभागार एक साथ जप में डूब गया। चलो रे मन वृंदावन की धुन ने वातावरण में ऐसी मधुरता घोल दी कि मानो हर श्रोता अपने भीतर के वृंदावन की यात्रा पर निकल पड़ा हो।

अचानक आकाश से पुष्प-पंखुड़ियों की वर्षा आरम्भ हुई गुलाब, गेंदे और विविध रंगों के फूलों ने पूरे सभागार को एक जीवंत चित्र में बदल दिया। फूलों की होली का यह दृश्य इतना मोहक था कि हर चेहरा खिल उठा, हर हृदय झूम उठा। 140 से अधिक श्रद्धालुओं ने इस उत्सव में भाग लिया और प्रत्येक व्यक्ति केवल दर्शक नहीं बल्कि इस दिव्य अनुभव का सहभागी बना गाते, झूमते और भक्ति में डूबते हुए।

जैसे-जैसे भजनों की लय बढ़ी, मंच पर कथक नर्तकों की उपस्थिति ने पूरे वातावरण को एक नई ऊँचाई दी। बनारस घराने के नर्तकों ने अपने भाव, मुद्राओं और पदचाप के माध्यम से भक्ति को साकार रूप दिया। फिर आया वह क्षण जिसने संध्या को ऐतिहासिक बना दिया जब स्वयं गुरुवर्य नलिनी और कमलिनी अस्थाना मंच पर उतरीं। जय राधा माधव जय कुंज बिहारी की धुन पर उनका नृत्य केवल प्रस्तुति नहीं था वह साधना थी, वह प्रेम था, वह समर्पण था। उनके हर कदम के साथ पूरा सभागार ऊर्जा से भरता गया और देखते ही देखते सभी श्रद्धालु खड़े होकर भक्ति में झूमने लगे। फिर महामंत्र से जब पूरा सभागार एक स्वर बन गया कार्यक्रम का अंतिम चरण था महामंत्र संकीर्तन। जैसे ही जप आरम्भ हुआ हरे कृष्ण हरे कृष्ण…पूरा सभागार एक स्वर में गूंज उठा। लोग खड़े थे, हाथ ऊपर थे, तालियाँ बज रही थीं, कदम थिरक रहे थे और उस क्षण में कोई दर्शक नहीं था, सब साधक थे। कार्यक्रम को सुनकर यह केवल कार्यक्रम का समापन नहीं था यह एक सामूहिक आध्यात्मिक जागरण था। भक्ति का नया रूप  अनुभव, सहभागिता और उत्सव भजन क्लबिंग की यह संकल्पना भक्ति को केवल सुनने या देखने तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे जीने का अवसर देती है। प्राची & मोहन संकीर्तन इस नई दिशा के अग्रदूत के रूप में उभर रहे हैं—जहाँ शास्त्रीयता, भक्ति और आधुनिक प्रस्तुति एक साथ मिलकर एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभव रचते हैं।

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