PFCD ने सर्जरी गैप के बीच रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट के लिए इंश्योरेंस कवर की किया मांग

शब्दवाणी सम्माचार टीवी, शुक्रवार 1 मई 2026 (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। द पार्टनरशिप टू फाइट क्रॉनिक डिजीज (PFCD) ने नई दिल्ली में देश के प्रमुख ऑर्थोपेडिक सर्जन्स की एक पैनल चर्चा आयोजित की। इस चर्चा में मैक्स हेल्थकेयर के ऑर्थोपेडिक्स, जॉइंट रिप्लेसमेंट और चीफ रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट विभाग के चेयरमैन डॉ. रामनीक महाजन, अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. हविंद टंडन और फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (FMRI) के डायरेक्टर और हेड डॉ. सुभाष झांगीड़ शामिल हुए। पैनल में भारत में तेजी से बढ़ रहे आर्थराइटिस के बोझ, टेक्नोलॉजी और इंश्योरेंस के बीच बढ़ती खाई और रोबोटिक असिस्टेड जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी के लिए बराबरी वाले कवर की जरूरत पर विस्तार से चर्चा हुई। भारत में हर साल अनुमानित 2.5–3.5 लाख जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी होती हैं, जिनमें से ज्यादातर अब भी पारंपरिक तकनीकों से की जाती हैं। टेक्नोलॉजी आधारित प्रक्रियाओं में बढ़ती दिलचस्पी के बावजूद, रोबोटिक असिस्टेड जॉइंट रिप्लेसमेंट फिलहाल कुल सर्जरी का केवल 5–10% ही हिस्सा है। इसका उपयोग मुख्य रूप से महानगरों के उन अस्पतालों तक सीमित है, जहां एडवांस सर्जिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशिक्षित विशेषज्ञ उपलब्ध हैं। पैनल ने इस बात पर जोर दिया कि मरीजों तक इस तकनीक की सीमित पहुंच का सबसे बड़ा कारण मेडिकल सीमाएं नहीं, बल्कि इंश्योरेंस गैप है।

रोबोटिक असिस्टेड जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी सर्जिकल प्रिसिजन, तेजी से रिकवरी और बेहतर दीर्घकालिक परिणाम प्रदान करती है। CT-बेस्ड प्लानिंग के जरिए सर्जन प्रत्येक मरीज की बॉडी स्ट्रक्चर के अनुसार सर्जरी को कस्टमाइज कर सकते हैं, जिससे संभावित जटिलताओं का पहले ही आकलन किया जा सकता है। यह तकनीक मानवीय त्रुटियों को कम करने, हेल्दी टिश्यू को सुरक्षित रखने और बेहतर जॉइंट फंक्शन सुनिश्चित करने में मदद करती है। हालांकि, एक बड़ी चुनौती यह है कि जो इलाज क्लिनिकली सबसे बेहतर है और जो इंश्योरेंस के तहत भुगतान योग्य है, उनके बीच अंतर लगातार बढ़ रहा है, जिससे इलाज के फैसले प्रभावित होने लगे हैं। मरीज अक्सर यह उम्मीद लेकर आते हैं कि उनका इंश्योरेंस उन्हें उपलब्ध सबसे बेहतर इलाज का कवर देगा। लेकिन हकीकत में उन्हें बताया जाता है कि रोबोटिक सर्जरी या तो आंशिक रूप से कवर होती है, या उस पर सब-लिमिट लागू होती है, और कई मामलों में तो यह कवर ही नहीं होती। नतीजतन, मरीजों को अपनी मेडिकल जरूरत के बजाय आर्थिक क्षमता के आधार पर निर्णय लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे पेशेंट-सेंट्रिक केयर का मूल सिद्धांत प्रभावित होता है। यह स्थिति तब भी बनी हुई है, जबकि भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने 2019 से मॉडर्न ट्रीटमेंट्स को शामिल करने की गाइडलाइंस जारी कर रखी हैं। इसके बावजूद, मौजूदा इंश्योरेंस प्रैक्टिस में मनमाने सब-लिमिट, रिइम्बर्समेंट में असमानता और कई मामलों में रोबोटिक सर्जरी के लिए पारंपरिक सर्जरी से भी कम भुगतान देखने को मिलता है। रोबोटिक तकनीक को कई बार जरूरत के बजाय लग्जरी के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जिससे इसकी पहुंच और सीमित हो जाती है। इन इंश्योरेंस गैप्स का सीधा असर क्लिनिकल प्रैक्टिस पर पड़ रहा है। डॉक्टरों को अब ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जहां उन्हें मरीज के लिए सबसे बेहतर इलाज की सलाह देने और उसकी आर्थिक स्थिति के बीच संतुलन बनाना होता है। कई अस्पताल भी रिइम्बर्समेंट की अनिश्चितता के चलते इंश्योर्ड मरीजों के लिए रोबोटिक सर्जरी की पेशकश सीमित कर देते हैं। अंततः मरीज या तो ज्यादा जेब से खर्च करते हैं या इलाज की गुणवत्ता से समझौता करते हैं।

मैक्स हेल्थकेयर के डॉ. रामनीक महाजन ने कहा रोबोटिक असिस्टेड जॉइंट रिप्लेसमेंट ऑर्थोपेडिक सर्जरी में एक महत्वपूर्ण प्रगति है, जो सर्जरी को अधिक सटीक और लगातार बेहतर बनाती है। इम्प्लांट की सटीक एलाइनमेंट बेहतर जॉइंट फंक्शन और लंबे समय के परिणामों के लिए जरूरी है। लेकिन जब इंश्योरेंस पॉलिसियां आधुनिक तकनीकों पर पाबंदी लगाती हैं, तो मरीजों को पारंपरिक विकल्प चुनने के लिए मजबूर होना पड़ता है। अपोलो हॉस्पिटल के डॉ. हविंद टंडन ने कहा क्लिनिकल प्रैक्टिस में यह आम है कि मरीज इंश्योरेंस सीमाओं के कारण रोबोटिक सर्जरी को लेकर हिचकिचाते हैं या अपना फैसला बदल देते हैं। कई मरीज बेहतर रिकवरी और मोबिलिटी के लिए एडवांस विकल्प चाहते हैं, लेकिन सब-लिमिट और रिइम्बर्समेंट से जुड़ी बाधाएं आर्थिक अनिश्चितता पैदा करती हैं। फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. सुभाष झांगीड़ ने कहा इंश्योरेंस फ्रेमवर्क को केवल शुरुआती लागत नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी के दीर्घकालिक फायदों को भी ध्यान में रखना चाहिए। रोबोटिक सर्जरी बेहतर इम्प्लांट पोजिशनिंग, कम जटिलताओं और रिवीजन सर्जरी की कम संभावना सुनिश्चित करती है। पैनलिस्ट्स ने यह भी जोर देकर कहा कि इंश्योरर्स को केवल शुरुआती खर्च के बजाय कुल उपचार लागत के आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए, जिसमें कम रिवीजन रेट, कम दोबारा भर्ती और तेज रिकवरी जैसे फायदे शामिल हैं। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह तकनीक मरीजों, इंश्योरर्स और पूरे हेल्थकेयर सिस्टम के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। PFCD के एशिया रिप्रेजेंटेटिव अमन गुप्ता ने कहा हमारा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक कारणों से कोई भी मरीज पीछे न रह जाए। हम ऐसी इंश्योरेंस पॉलिसियों की वकालत करते हैं जो रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट को एक जरूरी और वैल्यू-ड्रिवन इनोवेशन के रूप में मान्यता दें। PFCD एडवांस सर्जिकल इंटरवेंशन की जरूरत वाले मरीजों के लिए बराबरी की पहुंच की वकालत जारी रखे हुए है। संगठन का मानना है कि हर व्यक्ति को बिना भेदभाव वाले इंश्योरेंस कैप्स के बोझ के, मेडिकल सटीकता के उच्चतम स्तर तक पहुंच मिलनी चाहिए, जिससे पूरे भारतीय हेल्थकेयर सिस्टम को मजबूती मिल सके।

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