मातृत्व के बाद अखाड़े में शानदार वापसी

महिला खिलाड़ियों के जज़्बे को सलाम, कुश्ती में उच्च मानकों की आवश्यकता पर जोर

शब्दवाणी सम्माचार टीवी, रविवार 31 मई 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। कुश्ती जैसे अत्यंत चुनौतीपूर्ण और शारीरिक क्षमता की मांग करने वाले खेल में दो वर्षों का ब्रेक लेने के बाद, और फिर मातृत्व का दायित्व निभाने के उपरांत पुनः अखाड़े में उतरकर उत्कृष्ट प्रदर्शन करना किसी भी खिलाड़ी के अदम्य साहस, समर्पण और संघर्षशीलता का प्रमाण है। यह उपलब्धि राष्ट्रकवि सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध पंक्तियों की याद दिलाती है खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी ऐसी महिला खिलाड़ियों का संघर्ष और सफलता देश की नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि मातृत्व के बाद खेलों में वापसी करने वाली महिला खिलाड़ियों की उपलब्धियां यह सिद्ध करती हैं कि दृढ़ इच्छाशक्ति, अनुशासन और निरंतर अभ्यास के बल पर किसी भी चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है। इन खिलाड़ियों ने यह संदेश दिया है कि मातृत्व किसी महिला के खेल जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शक्ति और आत्मविश्वास की शुरुआत भी हो सकता है। वैज्ञानिक अध्ययनों और विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भावस्था और प्रसव के दौरान महिला के शरीर में अनेक महत्वपूर्ण शारीरिक परिवर्तन होते हैं। गर्भावस्था के समय रक्त की मात्रा (Blood Volume) तथा कार्डियक आउटपुट में उल्लेखनीय वृद्धि होती है, जिससे शरीर की ऑक्सीजन वहन क्षमता और कार्यक्षमता में सुधार होता है। प्रसव के बाद कई महिला एथलीटों में बेहतर सहनशक्ति (Stamina), फेफड़ों की कार्यक्षमता और ऑक्सीजन उपयोग क्षमता (VO₂ Max) देखने को मिलती है। इसके अतिरिक्त मातृत्व मानसिक दृढ़ता, धैर्य और संतुलन को भी मजबूत करता है, जिससे खिलाड़ी प्रतियोगिताओं के दबाव को अधिक प्रभावी ढंग से संभाल पाती हैं।

इस अवसर पर कुश्ती प्रतियोगिताओं के संचालन और गुणवत्ता को लेकर भी महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए हैं। खेल विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय कुश्ती महासंघ को रेफरियों और तकनीकी अधिकारियों की दक्षता को और अधिक सुदृढ़ बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास करने चाहिए। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अत्यधिक प्रशिक्षित, अनुभवी और योग्य रेफरियों तथा तकनीकी अधिकारियों की नियुक्ति से निर्णयों की पारदर्शिता बढ़ेगी और विवादों की संभावना कम होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, सक्षम तकनीकी अधिकारियों और रेफरियों की मौजूदगी से कोचों द्वारा दायर की जाने वाली आपत्तियों (Challenges) की संख्या भी घटती है, जिससे प्रतियोगिताएं अधिक निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और सुचारु रूप से संपन्न होती हैं। यह व्यवस्था खिलाड़ियों का ध्यान केवल अपने प्रदर्शन पर केंद्रित रखने में भी सहायक सिद्ध होती है। महिला खिलाड़ियों की यह प्रेरणादायक वापसी न केवल खेल जगत के लिए गौरव का विषय है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि मातृत्व और खेल उत्कृष्टता एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। ऐसे उदाहरण भारतीय खेलों में महिला सशक्तिकरण, समान अवसर और उत्कृष्टता की नई मिसाल स्थापित कर रहे हैं।

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