स्कूल पाठ्यक्रम में स्वास्थ पायक्रम भी शामिल हो : डॉ.राहुल मेहरा

शब्दवाणी सम्माचार टीवी, वीरवार 23 अप्रैल 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। भारत जैसे-जैसे भारत बुनियादी शिक्षा और सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने के प्रयास तेज कर रहा है, यह समझ बढ़ रही है कि छात्र स्वास्थ्य शैक्षणिक सफलता का एक महत्वपूर्ण लेकिन अभी तक कम ध्यान दिया गया निर्धारक है। शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि छात्रों के स्वस्थ व्यवहार और उनके शैक्षणिक प्रदर्शन के बीच गहरा संबंध है। यूनेस्को चेयर ऑन ग्लोबल हेल्थ एंड एजुकेशन के भारत के राष्ट्रीय प्रतिनिधि और तरंग हेल्थ एलायंस के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. राहुल मेहरा ने व्यापक स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रमों को शिक्षा प्रणाली का एक मुख्य हिस्सा बनाने का आह्वान किया है। डॉ. मेहरा ने छात्र सीखने में बाधा डालने वाली तीन परस्पर जुड़ी चुनौतियों की पहचान की, जिन्हें अक्सर शिक्षा नीति में नजरअंदाज किया जाता है। पहला, पोषण की कमी विशेषकर एनीमिया जो संज्ञानात्मक विकास और शैक्षणिक प्रदर्शन को प्रभावित करती है। दूसरा, बढ़ती निष्क्रिय जीवनशैली और स्क्रीन टाइम, जो बच्चों को मोटापा, मधुमेह और अन्य गैर-संचारी रोगों के शुरुआती जोखिम में डाल रही है। तीसरा और तेजी से बढ़ता हुआ संकट है मानसिक स्वास्थ्य का, जिसमें कई छात्र लगातार तनाव, चिंता और कम भावनात्मक स्थिरता का सामना कर रहे हैं जो सीखने और सहभागिता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। 

राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, डॉ. मेहरा ने बताया कि लगभग 50 प्रतिशत स्कूली बच्चे एनीमिया से ग्रस्त हैं जो संज्ञानात्मक विकास में कमी, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में गिरावट और स्मृति में कमी से जुड़ा हुआ है। किशोरों में, विशेष रूप से लड़कियों में, यह आंकड़ा लगभग 60 प्रतिशत तक है। वहीं, लगभग 20 प्रतिशत छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी देखी जाती हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 समग्र विकास के लिए पोषण, शारीरिक फिटनेस और भावनात्मक कल्याण के महत्व को स्वीकार करती है। हालांकि, स्कूलों में संरचित स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रमों का कार्यान्वयन अभी भी अपेक्षाकृत कमजोर है। जबकि NCERT पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य से जुड़े कुछ विषय शामिल किए गए हैं, लेकिन फोकस अभी भी केवल जानकारी देने पर है, न कि छात्रों के व्यवहार और स्वास्थ्य आदतों में सुधार पर। डॉ. मेहरा का कहना है कि ध्यान व्यवहार परिवर्तन की शिक्षण पद्धति पर होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नीतिगत इरादों को वास्तविक परिणामों में बदलने के लिए केवल एक अच्छा स्वास्थ्य पाठ्यक्रम ही नहीं, बल्कि प्रशिक्षित स्वास्थ्य शिक्षकों की भी आवश्यकता होगी। जिस तरह विज्ञान और गणित जैसे विषयों के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाता है, उसी तरह स्वास्थ्य शिक्षा के लिए भी उन्हें प्रशिक्षित और प्रमाणित किया जाना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बच्चों के व्यवहार में बदलाव लाने की पद्धति ज्ञान देने से अलग होती है। स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत माता-पिता को भी घर पर अच्छे स्वास्थ्य व्यवहार के आदर्श के रूप में प्रशिक्षित करना आवश्यक होगा। 

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