डॉ.नरेश के.अग्रवाल ने लुधियाना प्रोटोकॉल किया प्रस्तुत किया

 

शब्दवाणी सम्माचार टीवी, सोमवार 4 मई 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। ऑर्थोपेडिक इलाज में रिप्लेसमेंट से रीजेनरेशन की ओर बढ़ते रुझान को मजबूती देते हुए, वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. नरेश के. अग्रवाल ने नई दिल्ली के होटल नोवोटेल सिटी सेंटर में आयोजित तीसरे दिल्ली ऑर्थोबायोलॉजिक्स कोर्स 2026 में अपना चर्चित लुधियाना प्रोटोकॉल प्रस्तुत किया। यह सम्मेलन दिल्ली ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन के तत्वावधान में, इंडियन ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन के सहयोग से आयोजित हुआ, जिसमें देशभर के विशेषज्ञों ने ऑर्थोबायोलॉजिक्स के क्षेत्र में व्यावहारिक और साक्ष्य-आधारित इलाज तरीकों पर चर्चा की। कोर्स के दूसरे दिन घुटनों पर केंद्रित वैज्ञानिक सत्र में डॉ. अग्रवाल ने घुटने के ऑस्टियोआर्थराइटिस के प्रबंधन के लिए एक समेकित और कम हस्तक्षेप वाला दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। यह तरीका पारंपरिक जॉइंट रिप्लेसमेंट पर निर्भरता से आगे बढ़ते हुए, बीमारी के मूल कारण को समझने पर आधारित है। उनकी प्रस्तुति ने इस बात पर जोर दिया कि ऑस्टियोआर्थराइटिस केवल घिसाव नहीं, बल्कि शरीर में होने वाली लंबे समय की सूजन से जुड़ी स्थिति है। लुधियाना प्रोटोकॉल का आधार एक समग्र रणनीति है, जिसमें प्लेटलेट-रिच प्लाज़्मा (PRP), ग्रोथ फैक्टर्स और अन्य ऑर्थोबायोलॉजिक उपचारों को शरीर की सूजन कम करने वाले उपायों के साथ जोड़ा जाता है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक जोड़ को सुरक्षित रखना, उसके अंदर के वातावरण को बेहतर बनाना और लंबे समय तक कार्यक्षमता बनाए रखना है।

डॉ. अग्रवाल ने कहा ऑर्थोपेडिक्स का भविष्य जोड़ को बदलने में नहीं बल्कि उसे बचाने में है। यदि समय पर सही रीजेनरेटिव इलाज शुरू किया जाए, तो बड़ी संख्या में मरीजों में सर्जरी की जरूरत को टाला जा सकता है। इस शैक्षणिक मंच का नेतृत्व आयोजन सचिव डॉ. करुण जैन और वैज्ञानिक अध्यक्ष डॉ. आशिम गुप्ता ने किया। दोनों ने शोध और क्लिनिकल प्रैक्टिस के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर जोर दिया। डॉ.करुण जैन ने कहा दिल्ली ऑर्थोबायोलॉजिक्स कोर्स का उद्देश्य डॉक्टरों को ऐसा व्यावहारिक और साक्ष्य-आधारित ज्ञान देना है, जिसे वे सीधे मरीजों के इलाज में लागू कर सकें। डॉ. आशिम गुप्ता ने कहा ऑर्थोबायोलॉजिक्स तेजी से विकसित हो रहा क्षेत्र है। ऐसे में जरूरी है कि डॉक्टर वैज्ञानिक प्रगति के साथ अपडेट रहें और इलाज में सुरक्षा व मानकीकरण पर ध्यान दें। दो दिवसीय इस कोर्स में बोन मैरो एस्पिरेट कंसंट्रेट (BMAC), PRP, स्टेम सेल थेरेपी और अल्ट्रासाउंड-गाइडेड तकनीकों जैसे उन्नत उपचारों पर विस्तार से चर्चा हुई। यह ऑर्थोपेडिक देखभाल में गैर-सर्जिकल विकल्पों की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। डॉ. अग्रवाल की प्रस्तुति अपने व्यावहारिक अनुभव और स्पष्ट दृष्टिकोण के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। यह ऑर्थोपेडिक प्रैक्टिस में हो रहे एक बड़े बदलाव को दिखाती है, जहां प्राथमिकता जोड़ को सुरक्षित रखने, मरीज-केंद्रित इलाज और लंबे समय तक बेहतर परिणामों पर दी जा रही है। भारत में घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस के बढ़ते मामलों के बीच, लुधियाना प्रोटोकॉल जैसे तरीके शुरुआती हस्तक्षेप के लिए एक साक्ष्य-आधारित विकल्प के रूप में उभर रहे हैं, जो मरीजों की जीवन गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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