पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और आशीर्वाद पाने का पावन अवसर
6 सितंबर से 10 अक्टूबर तक श्रद्धा, तर्पण, दान और सेवा के माध्यम से पूर्वजों के स्मरण का विशेष काल
शब्दवाणी सम्माचार टीवी, वीरवार 24 सितम्बर 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। भारतीय सनातन परंपरा में पितृ पक्ष को पूर्वजों के स्मरण, श्रद्धा और कृतज्ञता का विशेष अवसर माना गया है। इस वर्ष पितृ पक्ष 26 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 तक रहेगा। यह अवधि केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं मानी जाती, बल्कि अपनी पारिवारिक जड़ों, संस्कारों और विरासत से जुड़ने तथा पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर भी मानी जाती है। आध्यात्मिक एवं हीलिंग विशेषज्ञ, ज्योतिष एवं न्यूमेरोलॉजिस्ट वान्या आर्या के अनुसार, पितृ पक्ष का मूल भाव श्रद्धा, कृतज्ञता और सेवा है। इस दौरान परिवार अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनके प्रति सम्मान व्यक्त कर सकता है और परिवार के सुख, शांति एवं समृद्धि के लिए सकारात्मक संकल्प ले सकता है।
नातन परंपरा में पितृ पक्ष के दौरान तर्पण और श्राद्ध का विशेष महत्व माना गया है। परिवार की परंपरा एवं मान्यताओं के अनुसार योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में तर्पण किया जा सकता है। इसका उद्देश्य पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करना है। पितृ पक्ष में जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र, अनाज अथवा आवश्यकता की अन्य वस्तुएं अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करने की परंपरा रही है। सेवा और दान को इस अवधि में करुणा तथा सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़कर देखा जाता है। गाय, कुत्ते, पक्षियों और अन्य जीवों को भोजन कराना भी सेवा का एक सरल माध्यम माना जाता है। यह परंपरा मनुष्य को प्रकृति और अन्य जीवों के प्रति संवेदनशील बनने का संदेश देती है। पितृ पक्ष आत्मचिंतन का अवसर भी माना जा सकता है। इस दौरान परिवार के पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर आपसी प्रेम, क्षमा और सहयोग की भावना को मजबूत करने का संकल्प लिया जा सकता है। पूर्वजों का स्मरण परिवार को आपसी संबंधों के महत्व का भी एहसास कराता है।
पूर्वजों को स्मरण करते हुए परिवार के स्वास्थ्य, सुख, शांति और समृद्धि के लिए सकारात्मक संकल्प लेना भी इस अवधि का एक महत्वपूर्ण भाव हो सकता है। अपने व्यवहार और कर्मों में सकारात्मक परिवर्तन लाना ही पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि का एक माध्यम बन सकता है। वान्या आर्या का कहना है कि पितृ पक्ष में किसी भी धार्मिक उपाय या परंपरा का मूल उद्देश्य भय नहीं, बल्कि श्रद्धा, कृतज्ञता और सेवा होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को श्राद्ध अथवा तर्पण की विधि की जानकारी नहीं है, तो उसे अपनी पारिवारिक परंपरा और मान्यताओं के अनुरूप किसी योग्य आचार्य से मार्गदर्शन लेना उचित है। उन्होंने कहा कि पूर्वज हमारे जीवन की उन जड़ों के समान हैं, जिनसे हमारी पारिवारिक एवं सांस्कृतिक विरासत जुड़ी होती है। पितृ पक्ष हमें अपनी इन जड़ों को याद करने, पूर्वजों के प्रति आभार व्यक्त करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए सकारात्मक संस्कार छोड़ने का संदेश देता है।

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