सस्टेन पोर्ट इंडिया 2026 में बंकरमैन की स्वदेशी DCCNC तकनीक का शानदार प्रदर्शन

कार्बन उत्सर्जन घटाने, ऊर्जा बचाने और इंडोर एयर क्वालिटी सुधारने की तकनीक ने विशेषज्ञों का खींचा ध्यान

शब्दवाणी सम्माचार टीवी, शनिवार 15 अगस्त 2026, (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। बंदरगाहों और बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में कार्बन उत्सर्जन कम करने, ऊर्जा की खपत घटाने तथा इंडोर एयर क्वालिटी में सुधार लाने के उद्देश्य से विकसित **बंकरमैन की स्वदेशी ‘डायरेक्ट कार्बन कैप्चर एट नेगेटिव कॉस्ट (DCCNC)’ तकनीक का सस्टेन पोर्ट इंडिया 2026 सम्मेलन में प्रभावशाली प्रदर्शन किया गया। तकनीक को बंदरगाहों के लिए टिकाऊ, ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल समाधान के रूप में विशेषज्ञों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। नई दिल्ली स्थित स्कोप कन्वेंशन सेंटर में आयोजित सम्मेलन का आयोजन मिशन एनर्जी फाउंडेशन द्वारा भारत सरकार के पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय के सहयोग से किया गया। सम्मेलन में देश के प्रमुख बंदरगाहों एवं प्रतिष्ठित संस्थानों से इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और कंसल्टेंट्स ने भाग लिया।

इस अवसर पर बंकरमैन के संस्थापक मेजर जनरल (डॉ.) श्री पाल, VSM (सेवानिवृत्त) ने DCCNC तकनीक पर शोधपत्र प्रस्तुत करते हुए बताया कि यह तकनीक मौजूदा एयर-कंडीशनिंग एवं वेंटिलेशन प्रणालियों के साथ एकीकृत होकर कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), वॉलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स (VOCs) सहित अन्य वायु प्रदूषकों को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है। इसके साथ ही एयर-कंडीशनिंग प्रणालियों की ऊर्जा आवश्यकता को कम करने की क्षमता भी इस तकनीक को विशेष बनाती है। शोधपत्र के अनुसार, पारंपरिक कार्बन कैप्चर प्रणालियों में जहां भारी पूंजी निवेश और लगातार परिचालन खर्च की आवश्यकता होती है, वहीं DCCNC को ऊर्जा बचत और परिचालन लागत में कमी के साथ कार्बन कैप्चर को आर्थिक रूप से अधिक व्यवहारिक बनाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। तकनीक के माध्यम से एयर-कंडीशनिंग क्षमता, बिजली खपत और परिचालन व्यय में कमी लाने की संभावनाएं भी प्रस्तुत की गईं।

मेजर जनरल डॉ. श्री पाल ने कहा कि देश के विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आज की बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रहित की महत्वपूर्ण परियोजनाओं में विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय आधुनिक स्वदेशी तकनीक के माध्यम से दोनों उद्देश्यों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सकता है। उन्होंने ग्रेट निकोबार आइलैंड विकास परियोजना का उदाहरण देते हुए DCCNC तकनीक की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उनके अनुसार, प्रस्तुत गणनाओं के आधार पर परियोजना में संभावित रूप से प्रभावित लगभग 10 लाख पेड़ों के स्थान पर 2.1 करोड़ से अधिक वृक्षों के बराबर पर्यावरणीय लाभ प्राप्त करने की क्षमता विकसित की जा सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि ऊर्जा बचत और कार्बन क्रेडिट से परियोजना में महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ की संभावना बन सकती है। डॉ. श्री पाल के अनुसार, प्रस्तुत आकलन में एयर-कंडीशनिंग ऊर्जा की बचत से लगभग 700 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष तथा कार्बन क्रेडिट से 100 करोड़ रुपये से अधिक वार्षिक आय की संभावनाएं बताई गई हैं। हालांकि, ये आंकड़े परियोजना-विशिष्ट आकलन और वास्तविक कार्यान्वयन की परिस्थितियों पर निर्भर करेंगे।

बंकरमैन के अनुसार, DCCNC तकनीक की व्यावहारिक क्षमता का प्रदर्शन इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड की गुवाहाटी रिफाइनरी में चल रहे एक प्रोजेक्ट से भी सामने आया है। कंपनी के मुताबिक यह परियोजना पिछले करीब दो वर्षों से संचालित है और इसके अनुभव के आधार पर देश की अन्य परियोजनाओं में भी इस तकनीक के उपयोग की संभावनाएं तलाश की जा रही हैं। सस्टेन पोर्ट इंडिया 2026 में प्रस्तुत शोधपत्र में बंदरगाहों को DCCNC तकनीक के व्यापक उपयोग के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया गया। आधुनिक बंदरगाहों में कार्गो टर्मिनल, वेयरहाउस, यात्री सुविधाएं, नियंत्रण कक्ष, प्रशासनिक भवन और अन्य संरचनाएं बड़ी मात्रा में एयर-कंडीशनिंग एवं वेंटिलेशन प्रणालियों पर निर्भर रहती हैं। इन परिसरों में DCCNC तकनीक के एकीकृत उपयोग से **कार्बन उत्सर्जन में कमी, ऊर्जा संरक्षण, एयर-कंडीशनिंग लोड में संभावित कमी और इंडोर एयर क्वालिटी प्रबंधन जैसे कई क्षेत्रों को एक साथ संबोधित किया जा सकता है। मेजर जनरल डॉ. श्री पाल ने कहा कि सतत विकास को पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच किसी एक विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उपयुक्त स्वदेशी तकनीक के माध्यम से दोनों उद्देश्यों को एक साथ आगे बढ़ाना संभव है। सम्मेलन में DCCNC तकनीक का प्रदर्शन भारत में विकसित पर्यावरणीय एवं ऊर्जा-कुशल तकनीकों की बढ़ती क्षमता को रेखांकित करने के साथ-साथ देश के बंदरगाह एवं बड़े बुनियादी ढांचा क्षेत्र में कम-कार्बन विकास की नई संभावनाओं की ओर भी संकेत करता है।

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