यशोदा मेडिसिटी में 18वीं मंज़िल से गिरने वाले 15 साल के लड़के की बची जान

शब्दवाणी सम्माचार टीवी, शुक्रवार 16 अक्टूबर 2026 (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), गाज़ियाबाद। गाज़ियाबाद के वसुंधरा का रहने वाला 15 साल का एक लड़का 18वीं मंज़िल से गिरने के बाद ठीक हो गया है। उसका इंदिरापुरम के यशोदा मेडिसिटी में लगभग दो महीने तक इलाज चला। जब उसे हॉस्पिटल लाया गया था, तो वह हाइपोटेंसिव शॉक में था। उसका बहुत ज़्यादा खून बह चुका था और रीढ़ की हड्डी, छाती, फेफड़ों, लीवर, अन्य अंगों तथा सॉफ्ट टिश्यू में गंभीर चोटें आई थीं। उसकी हालत को स्थिर करने के लिए उसे तुरंत इंट्यूबेशन, वेंटिलेटर सपोर्ट, कई बार ब्लड और फ़्लूड ट्रांसफ़्यूज़न और इनोट्रोपिक दवाओं की ज़रूरत पड़ी। यशोदा मेडिसिटी के डॉक्टरों ने पाया कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूटी हुई थी और अपनी जगह से हट गई थी, साथ ही चोट, हीमोथोरैक्स और कई पसलियों में फ्रैक्चर, लीवर में चोट, दाहिने हाथ और बाएं पैर में फ्रैक्चर, सिर की त्वचा पर गहरा घाव, नाक की हड्डी टूटना और कूल्हे के हिस्से और दाहिनी जांघ पर त्वचा और ऊतकों का बड़े पैमाने पर उखड़ना (डीग्लोविंग चोट) जैसी समस्याएं थीं। चोट की गंभीरता को देखते हुए यशोदा मेडिसिटी में कई स्पेशलिटीज़ के बीच तालमेल के साथ इलाज की ज़रूरत थी। इलाज में न्यूरोसर्जरी, ऑर्थोपेडिक्स, प्लास्टिक, एस्थेटिक और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, क्रिटिकल केयर, रेस्पिरेटरी मेडिसिन, कार्डियोलॉजी और अन्य सहयोगी विभागों की टीमें शामिल थीं। सभी ने मरीज़ के इलाज के दौरान जांच, हालत स्थिर करने, सर्जरी और लगातार निगरानी का काम किया। मरीज़ की हालत इतनी गंभीर थी कि एक साथ कई सर्जरी नहीं की जा सकती थीं, इसलिए इलाज करने वाली टीमों को यह तय करना पड़ा कि किस चोट का इलाज सबसे पहले ज़रूरी है। परिवार के साथ विस्तार से बातचीत करने और जोखिम भरे इलाज के लिए उनकी सहमति लेने के बाद यशोदा मेडिसिटी में न्यूरोसर्जरी के प्रिंसिपल डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. राजिंदर कुमार ने मल्टी-डिसिप्लिनरी ट्रॉमा और सर्जिकल टीमों के साथ मिलकर पहली बड़ी प्रक्रिया के तौर पर स्पाइनल फिक्सेशन किया। बाद में जब हालत स्थिर हो गई, तो बाकी चोटों का इलाज अलग-अलग चरणों में किया गया।

डॉ राजिंदर कुमार ने कहा यह मामला बहुत ज़्यादा खतरे से भरा था। इसमें कई जानलेवा चोटें थीं और बहुत ज़्यादा खून बह गया था। सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना था कि मरीज़ के गहरे शॉक में होने के बावजूद सबसे पहले किस चीज़ का इलाज किया जाए। रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर, डिसलोकेशन और कॉर्ड की चोट को देखते हुए मरीज़ की अस्थिर हालत के बावजूद रीढ़ की हड्डी को सुरक्षित रखने के लिए स्पाइनल फिक्सेशन यानी रीढ़ की हड्डी को स्थिर करना सबसे ज़रूरी इलाज था। एक बार जब रीढ़ की हड्डी स्थिर हो गई, तो हम बाकी चोटों का इलाज चरण-दर-चरण कर सके। इस कारण मरीज़ हर प्रक्रिया को सुरक्षित रूप से झेल सका। इस मामले की जटिलता के कारण इलाज के दौरान कई विभागों के बीच लगातार निगरानी और तालमेल की ज़रूरत थी। इसके बाद के इलाज में कई फ्रैक्चर को ऑर्थोपेडिक तरीके से ठीक करना, सिर की त्वचा के घाव को भरना और नाक के फ्रैक्चर का इलाज करना शामिल था। ऑर्थोपेडिक्स टीम में यशोदा मेडिसिटी के ऑर्थोपेडिक्स, जॉइंट रिप्लेसमेंट और स्पोर्ट्स मेडिसिन के डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. ब्रजेश कौशले शामिल थे। उन्होंने कई फ्रैक्चर के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कम से कम चार और सुधार प्रक्रियाएं (रिविजन प्रोसीजर) कीं। त्वचा के बड़े हिस्से के उधड़ जाने (डीग्लोविंग) जैसी गंभीर चोटों के लिए बार-बार घाव की ड्रेसिंग और और सर्जरी की ज़रूरत पड़ी। बाद में रीढ़ की हड्डी के घाव की दोबारा जांच की गई और उसे ठीक किया गया। इलाज के इस लंबे दौर में पीडियाट्रिक ICU टीम  में यशोदा मेडिसिटी के पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. करण अहलूवालिया और पीडियाट्रिक इंटेंसिविस्ट कंसल्टेंट डॉ. अनुज ध्यानी शामिल थे। उन्होंने क्रिटिकल  देखभाल के दौरान लड़के की मदद की और ठीक होने के समय आई मुश्किलों को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

यशोदा मेडिसिटी में प्लास्टिक, एस्थेटिक और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी के प्रिंसिपल कंसल्टेंट डॉ. शोभित शर्मा ने कहा सॉफ्ट टिश्यूज (शरीर के मुलायम ऊतकों) में गंभीर चोटें होने के कारण यह मामला काफी चुनौतीपूर्ण था। नाक की हड्डी टूटने के साथ-साथ त्वचा छिलने से बड़े घाव भी हो गए थे। इन घावों की नियमित ड्रेसिंग करनी पड़ती थी और मरीज की हालत पर लगातार नजर रखनी जरूरी थी। घावों को ठीक करने के लिए रिवीजन प्रोसीजर भी किया गया। मरीज को कई अन्य गंभीर बीमारियां भी थीं, जिनका इलाज चल रहा था। इसलिए सभी चोटों का सही तरीके से इलाज करने के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ डॉक्टरों के बीच बेहतर तालमेल और सावधानी बरतना जरूरी था। मरीज की इलाज के दौरान कई अन्य चिकित्सकीय जटिलताएँ भी सामने आईं, जिनके कारण लगातार क्रिटिकल केयर और संक्रमण के विशेष उपचार की आवश्यकता पड़ी। लगभग दो महीने तक अस्पताल में भर्ती रहने के बाद किशोर को छुट्टी दे दी गई है। अब उसे आगे भी नियमित फॉलो-अप और रिहैबिलिटेशन की आवश्यकता होगी। किशोर के ठीक होने का यह मामला गंभीर रूप से घायल मरीजों के इलाज में तेजी से उनकी हालत स्थिर करने, विशेषज्ञों की देखरेख और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर तालमेल के महत्व को दर्शाता है। यशोदा मेडिसिटी में मरीज की बदलती स्थिति के अनुसार इलाज की योजना सावधानीपूर्वक बनाई गई। हर चरण में उन चोटों को प्राथमिकता दी गई, जिनका तुरंत उपचार जरूरी था, ताकि मरीज की हालत स्थिर की जा सके और उसके ठीक होने की प्रक्रिया में मदद मिल सके।

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