फिल्म समीक्षा : चिता (Pyre) पहाड़ों की खामोशी में गूंजता बुजुर्ग माता-पिता का दर्द
पलायन, अकेलेपन और रिश्तों की संवेदनशील कहानी
शब्दवाणी सम्माचार टीवी, रविवार 11 अक्टूबर 2026, फिल्म समीक्षक : रहना परवीन (प्रबंध सम्पादकीय श्री अशोक लालवानी 8803818844), नई दिल्ली। फिल्म चिता (Pyre) शुक्रवार 9 अक्टूबर 2026 को विशेष प्रेस शो डिलाइट, दिल्ली में मुझे देखने का अवसर मिला। फिल्म चिता (Pyre) में पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी इत्यादि मुख्य कलाकार हैं। फिल्म का निर्देशन विनोद कापड़ी ने दिया है फिल्म सामाजिक, पारिवारिक और भावनात्मक ड्रामा पर आधारित है। फिल्म को सेंसर बोर्ड ने U प्रमाणपत्र दिया है यानी 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के दर्शक इसे सिनेमाघरों में देख सकते हैं। फिल्म की अवधि 111 मिनट (1 घंटा 51 मिनट) है। फिल्म सिनेमाघरों में 23 अक्टूबर 2026 को प्रदर्शित होगी। निर्देशक विनोद कापड़ी की फिल्म चिता (Pyre) ने अंतरराष्ट्रीय फिल्म जगत में उल्लेखनीय पहचान बनाई है। फिल्म को एस्टोनिया के प्रतिष्ठित टालिन ब्लैक नाइट्स फिल्म महोत्सव में दर्शक पुरस्कार, जर्मनी के स्टटगार्ट में जर्मन स्टार ऑफ इंडिया, ब्रिटेन के लंदन और बर्मिंघम फिल्म महोत्सवों में दर्शक पुरस्कार तथा अमेरिका में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक सहित कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। फिल्म ने बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी जूरी की विशेष प्रशंसा हासिल की। इसे अब तक 18 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। सिनेमा जब मनोरंजन की सीमाओं से आगे बढ़कर समाज की अनकही पीड़ा को पर्दे पर उतारता है, तब वह दर्शकों को सोचने के लिए मजबूर करता है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक विनोद कापड़ी की फिल्म चिता इसी संवेदनशील विषय को केंद्र में रखती है। उत्तराखंड के कुमाऊं हिमालय की पृष्ठभूमि में बनी यह फिल्म एक बुजुर्ग दंपति के जीवन, उनके आपसी प्रेम, अकेलेपन और बच्चों से बढ़ती दूरी की कहानी है।
फिल्म चिता (Pyre) की कहानी उन बुजुर्ग माता-पिता की भावनात्मक दुनिया को सामने लाती है, जिनके बच्चे बेहतर भविष्य और रोजगार की तलाश में गांव छोड़कर दूर जा चुके हैं। कभी परिवार की चहल-पहल से भरा घर अब यादों और इंतजार का ठिकाना बन गया है। उम्र के इस पड़ाव पर पति-पत्नी एक-दूसरे का सहारा हैं, लेकिन उनके जीवन में अपनों की दूरी से पैदा हुई खालीपन की पीड़ा भी मौजूद है। फिल्म का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह पलायन को केवल रोजगार अथवा आर्थिक समस्या के रूप में नहीं दिखाती बल्कि उसके पीछे छूट जाने वाले माता-पिता के भावनात्मक संसार पर भी ध्यान केंद्रित करती है। पहाड़ों से शहरों की ओर जाने वाली युवा पीढ़ी के फैसलों के बीच बुजुर्गों की जरूरतों और उनकी भावनाओं पर विचार करने का अवसर मिलता है। फिल्म की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में इसके मुख्य कलाकार पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी हैं। लगभग 80 वर्षीय पदम सिंह कापड़ी सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी हैं जबकि लगभग 70 वर्षीय हीरा देवी उत्तराखंड की निवासी हैं। दोनों ने इससे पहले अभिनय की दुनिया में काम नहीं किया था। निर्देशक ने ऐसे लोगों को चुना, जिनके जीवन के अनुभव फिल्म के पात्रों की वास्तविकता के करीब हैं। यही चयन फिल्म की स्वाभाविकता को विशेष बना सकता है। स्थापित सितारों और चमक-दमक से अलग, आम जीवन का अनुभव रखने वाले कलाकार कहानी को जमीन से जोड़ते हैं। उनके अभिनय का मूल्यांकन करते समय संवादों की भव्यता से अधिक भावों की सच्चाई, चेहरे के उतार-चढ़ाव और मौन की अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण होगी।
फिल्म की कहानी में विनोद कापड़ी ने हिमालयी परिवेश को कहानी का अभिन्न हिस्सा बनाया है। उत्तराखंड के पहाड़, दूर-दराज के गांव और शांत वातावरण इस कथा के भावनात्मक पक्ष को उभारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फिल्म का उद्देश्य तेज रफ्तार घटनाओं या मनोरंजन के पारंपरिक मसालों के बजाय जीवन की साधारण परिस्थितियों में छिपे गहरे अर्थों को सामने लाना है। फिल्म का संगीत माइकल डैना ने तैयार किया है और गीतों के बोल गुलजार ने लिखे हैं। ऐसे संवेदनशील विषय में संगीत और गीतों से भावनाओं को गहराई देने की संभावना रहती है। हालांकि फिल्म की वास्तविक सिनेमाई प्रभावशीलता का अंतिम आकलन उसके संपूर्ण प्रदर्शन के बाद ही किया जा सकेगा। चिता (Pyre) का विषय आज के समाज से सीधे जुड़ता है। बेहतर शिक्षा, रोजगार और सुविधाओं के लिए बच्चों का घर से दूर जाना स्वाभाविक है, लेकिन इस बदलाव के बीच बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल और भावनात्मक जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फिल्म परिवार, जिम्मेदारी और साथ के महत्व पर विचार करने का अवसर देती है। फिल्म का शीर्षक भी जीवन, मृत्यु और पीछे छूट जाने वाली स्मृतियों जैसे गंभीर सवालों की ओर संकेत करता है। इसकी कहानी दर्शकों को यह सोचने के लिए प्रेरित कर सकती है कि माता-पिता को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं बल्कि समय, संवाद और अपनापन भी चाहिए। फिल्म देखने का मजा खराब ना हो इसलिए पूरी कहानी आपको नहीं बता रही हूँ कियोंकि फिल्म को आप अपने दोस्तों और परिवार के साथ सिनेमाघरों में जाकर बड़े पर्दे पर देखने का अलग मजा आएगा। मैँ इस फिल्म को पांच में से साढ़े तीन स्टार देती हूँ और जो दर्शक एक ऐसी दर्द भरी फिल्म जिसे देखकर आखों में आंसू लेकर सिनेमाघर से बाहर आना पसंद करता है उनके लिए पांच में से चार स्टार देती हूँ।


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें